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जीवन की चादर को साफ करना होगा,तभी सत्व और समर्पण जीवन में स्थायी रूप से प्रकट होंगे-आचार्य पद्मदर्शनसूरि

रांदेर रोड स्थित श्री शालिभद्र श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य पद्मदर्शनसूरि जी का भव्य स्वागत,

धर्मसभा में दी जीवन-संदेशी अमृत वाणी

सूरतरांदेर रोड स्थित श्री शालिभद्र श्वेतांबर मू. पू. जैन संघ में जैनाचार्य पूज्य प​द्मदर्शनसूरि जी महाराज आदिनु ठाणा पधारते ही ढोल–नगाड़ों और बेड़ों से सजी बहनों द्वारा भव्य स्वागत किया गया। अक्षत से नूतन आचार्य श्री का बढ़ामणा (अभिनंदन) किया गया। इस पावन अवसर पर एक विशाल धर्मसभा का आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रावक–श्राविकाएं उपस्थित रहीं।
धर्मसभा में पूज्य आचार्य श्री पद्मदर्शनसूरि जी महाराज ने अमृतवाणी के माध्यम से जीवन मूल्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सम्राट बनने के लिए सत्ता, संपत्ति और सौंदर्य आवश्यक नहीं, बल्कि सत्व, समर्पण और शुद्धता जरूरी है। सत्ता और संपत्ति स्थायी नहीं होते, यह किसी भी क्षण हाथ से निकल सकते हैं। यदि मनुष्य के पास सत्व है तो खोया हुआ भी वापस पाया जा सकता है। आज सत्वहीनता के वायरस ने लोगों को कमजोर बना दिया है और मनुष्य तन, मन और जीवन से सत्व खो बैठा है।


आचार्यश्री ने कहा कि प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने के लिए सत्व आवश्यक है। आज मनुष्य हर क्षेत्र में दबता जा रहा है, उसके पास चुनौती देने का साहस और शक्ति कम होती जा रही है। दुनिया मंदी, बीमारी, महंगाई और मनी क्राइसिस जैसे विषचक्र से गुजर रही है, ऐसे समय में किसी को तो जागना होगा। जब सत्व नष्ट हो जाता है, तब मनुष्य सिर उठाकर चल भी नहीं पाता।
उन्होंने आगे कहा कि सत्वशाली बनने के लिए माता-पिता, बड़ों और देव–गुरु के प्रति समर्पित होना जरूरी है। समर्पण की कमी के कारण ही संघर्ष और टकराव बढ़े हैं। विशेष रूप से आज की युवा पीढ़ी तकनीक के प्रति अधिक समर्पित हो गई है, जिसके कारण भीतर की संवेदनाएं कम हो रही हैं।
परिवार, समाज और रिश्तों में मैत्री, प्रेम, भावना और सद्भाव जैसी अनुभूतियों का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। आज समर्पण केवल वहीं दिखाई देता है जहाँ स्वार्थ मौजूद है, अन्यथा हर जगह संघर्ष और तनाव दिखाई देता है। समर्पण लाने के लिए जीवन में शुद्धता लानी आवश्यक है।

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