धर्मसामाजिक/ धार्मिक

समता और अहिंसा महाव्रत की पालना में रखें पूर्ण जागरूकता : महातपस्वी महाश्रमण

आचार्यश्री ने आज के निर्धारित विषय को किया व्याख्यायित 

चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को भी आचार्यश्री ने किया उत्तरित 
13.06.2026, शनिवार, लाडनूं :
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शनिवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘सब जीवों के प्रति समता’ को व्याख्यायित कर पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि साधु जीवन में समता और सम्पूर्ण जीवन के प्राणातिपात से विरमण रखना होता है। यह बहुत दुरुह कार्य होता है। जीवन भर के लिए अहिंसा और समता की साधना करना बहुत कठिन होता है। अहिंसा और समता का मानों गहरा सम्बन्ध है। अहिंसा है तो समता होगी ही और समता है तो अहिंसा भी होगी ही।
अहिंसा के दो रूप बताए गए हैं, जिसे हम द्रव्य अहिंसा और भाव अहिंसा। ऐसा ही हिंसा के संदर्भ में भी बताया गया है-द्रव्य हिंसा और भाव हिंसा। कहीं द्रव्य हिंसा है, भाव हिंसा नहीं और कहीं भाव हिंसा है और द्रव्य हिंसा नहीं। कहीं भाव और द्रव्य दोनों प्रकार की हिंसाएं हैं तो कहीं सम्पूर्ण अहिंसा के संदर्भ में न भाव हिंसा होती है और न ही द्रव्य हिंसा होती है। प्रायः पूर्णतया हिंसा से विरत रहना असंभव-सा है। शरीर की रक्षा करना, शरीर को स्वस्थ रखना है तो किसी न किसी रूप में प्रायः हिंसा तो हो ही जाती है। एक साधु, जिसने जीवन भर के लिए सर्वप्राणातिपात से विमरण महाव्रत ले लेता है, किन्तु उससे भी द्रव्य हिंसा तो संभव ही है। जैसे शरीर के आवश्यक कार्य के लिए जाना हो और वर्षा हो रही हो, कहीं घास आदि भी उगी हुई हो तो ऐसी स्थिति में साधु को जाना ही होता है। इस प्रकार कच्चे पानी के लगने आदि से द्रव्य हिंसा तो हो ही सकती है।
कई बार साधु विहार करते हैं और वर्षा आ जाती है तो अपकाय के जीवों की हिंसा हो जाती है, लेकिन जहां साधु समता में है तो वहां द्रव्य हिंसा ही मान्य होती है। साधु अपने विधि से चलता है, और हिंसा हो जाए तो वहां द्रव्य हिंसा ही होती है।
एक ओर शिकारी जंगल में शिकार करने के लिए गया, उसे जीव देखा और उसने लक्ष्य करके बाण छोड़ा, लेकिन निशाना चूक गया और वह जीव नहीं मरा तो वहां द्रव्य हिंसा तो नहीं हुई, लेकिन भाव हिंसा अवश्य हो गई। इस संदर्भ में एक और बात बताई गई कि शिकारी ने बाण छोड़ा और जीव मर भी गया तो वहां द्रव्य और भाव हिंसा दोनों हो जाती है। इसी प्रकार एक साधु अपनी संयम और जागरूकतापूर्वक चल रहा है और कोई जीव नहीं मरा, तो वहां न कोई भाव हिंसा हुई और न ही द्रव्य हिंसा हुई। साधु के लिए जीवन भर के लिए अहिंसा महाव्रत का पालन करने वाला होता है।
इस प्रकार अहिंसा और समता में संबंध होता है। साधु के जीवन समता और अहिंसा का प्रभाव बना रहे। सभी जीवों को अपने समान समझते हुए जीवन भर के लिए हिंसा से बचने का प्रयास करे। साधु को अपने प्रत्येक क्रिया में सजगता रखे और संयम रखना और पूर्ण जागरूकता के साथ अहिंसा का पालन होता है। साधु के जीवन में समता की साधना और अहिंसा महाव्रत का सम्पूर्ण रूप से पालन होता रहे, ऐसा प्रयास करना चाहिए।
गृहस्थ भी अपने जीवन अहिंसा के अणुव्रत का पालन करने का प्रयास करे। जितना संभव हो सके, अपने से किसी जीव की हिंसा से बचने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में जहां तक संभव हो आदमी को संकल्पजा हिंसा से बचने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किया।

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