धर्मसामाजिक/ धार्मिक

आस्तिक विचारधारा वर्तमान जीवन के लिए भी कल्याणकारी : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण 

क्या परलोक है’ विषय को शांतिदूत ने किया प्रतिपादित

आचार्यश्री द्वारा कराए जाने वाले ध्यान के प्रयोग का लाभ उठा रहा है चतुर्विध धर्मसंघ                           लाडनूं :जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी जैन विश्व भारती परिसर से ज्ञानगंगा की अविरल धारा प्रवाहित कर रहे हैं, जो जन-जन के मानस को अभिसिंचित कर रही है। इस अविरल ज्ञानगंगा में डुबकी लगाने के लिए नित्य प्रति देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। श्रद्धालुओं के आवागमन से जैन विश्व भारती ही नहीं, पूरा लाडनूं नगर मानों जनसमुदाय की उपस्थिति से पटा हुआ-सा नजर आ रहा है।                                                   

शुक्रवार को प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के लिए शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपने प्रवास स्थल से सुधर्मा सभा में पधारे। आचार्यश्री के श्रीमुख से उच्चरित महामंत्रोच्चार के साथ आज के कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत को प्रस्तुति दी। तदुपरान्त युगप्रधान अनुशास्ता ने चतुर्विध धर्मसंघ को थोड़ी देर तक ध्यान का प्रयोग कराया।                                                                                         

युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘क्या परलोक है?’ को व्याख्यायित करते हुए चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि दो विचारधाराएं हैं-आस्तिक विचारधारा और नास्तिक विचारधारा। जो परलोक, आत्मा, पुण्य-पाप, मोक्ष आदि में विश्वास करता है, वह आस्तिक होता है और जो परलोक को नहीं मानता, आत्मा-परमात्मा को नहीं मानता, पुण्य-पाप को नहीं मानता, वह नास्तिक होता है। नास्तिकवाद कहता है कि मौज-मस्ती में जीवन जीओ, जो मन में आ जाए वहीं, करो, ऋण लेकर घी पीओ, क्योंकि इस शरीर के नष्ट हो जाने पर पुनः कहां आना है। पुनर्जन्म होगा नहीं, तो इस जीवन में खूब ऐश-आराम करो।

वहीं आस्तिक विचारधारा कहती है कि आत्मा है, परलोक है, पुण्य-पाप का फल होता है, पुनर्जन्म भी होता है। कई सारी बातों के माध्यम से इसे माना जा सकता है कि पूर्वजन्म और पुनर्जन्म होता है, आत्मा और परलोक आदि का कुछ प्रमाण भी दिया जा सकता है। जो चीज दिखाई देता है, उसका आधार है ही नहीं, ऐसा नहीं होता। जो नहीं दिखता, वह भी होता है।

शास्त्र में कहा गया है कि आदमी स्वर्गलोक है अथवा नहीं, इस बात को छोड़कर अच्छे कार्यों को करने का प्रयास करना चाहिए। यदि स्वर्ग हुआ तो अच्छे कार्य किए हैं तो उसका अच्छा फल मिलेगा। वर्तमान जीवन भी अच्छा रहेगा। जीवन में शांति रहेगी। यदि नहीं हुआ तो भी वर्तमान जीवन अच्छा रहेगा ही, अच्छे कार्यों को करने से भला आदमी का क्या नुक्सान होने वाला है। यदि परलोक है तो फिर नास्तिक आदमी का क्या हाल होगा, वह ही जाने। पाप करने वाले को उसका कैसा परिणाम भोगना पड़ेगा। इसलिए आदमी को अपने जीवन में अच्छे कार्यों को करने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में जीतना संभव हो, अपने जीवन में त्याग, संयम, धर्म, ध्यान में समय लगाने और साधना करने का प्रयास करना चाहिए।

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