संसार सागर से पार जाने के लिए मिथ्यात्व मोह को तोड़ना होगा- आचार्य शिव मुनि

सूरत।आचार्य भगवन् ने दैनिक उद्बोधन में समाधि का विश्लेषण करते हुए फरमाया कि समाधि का अर्थ है बुद्धि में समता आ जाए। यह संसार परिवर्तनशील है, यहां मान-अपमान, जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख आदि है यह सारा दुःख देह का है न कि आत्मा का। इस संसार जगत में पशु-पक्षी, मनुष्य, देव, आचार्य, उपाध्याय सभी में समान आत्मा है। देह में आत्मा प्रमुख है। जिस तरह से सोना कीचड़ में या नाली में भी गिर जाए तो वह खराब नहीं होता उसकी शुद्धता बनी रहती है। उसी प्रकार आत्मा का स्वभाव है कि वह शुद्ध है।
आचार्य भगवन ने आगे फरमाया कि व्यक्ति आत्मा को गौण कर देह को प्रमुख मानता है। जीवनभर परिवार के रिश्ते-नाते में उलझा रहता है जो उसका अज्ञान है। इस संसार सागर से पार जाने के लिए मिथ्यात्व मोह को तोड़ना होगा। पुरुषार्थ के बल से ही संसार सागर से पार हो सकते हैं। उसकी एक ही विधि है हर क्रिया में आत्मा और शरीर का भेद करो। कार्य करते हुए भी अपनी आत्मा को नहीं भूलें, हर किसी के शरीर को नहीं उसमें उसके आत्म तत्व को देखो। प्रातः भ्रमण करते हुए भी आत्मा और शरीर का भेद कर सकते हैं।
आचार्य श्री जी ने धर्म संस्कार को जरूरी बताते हुए फरमाया कि मनुष्य जीवन में धर्म का महत्त्व है। धर्म के संस्कार व्यक्ति में माता-पिता, गुरु के द्वारा मिलते हैं। अपने बच्चों को छोटी उम्र से ही ध्यान के संस्कार दिये जायें तो उसमें एकाग्रता बढ़ेगी और वह अपने भावी जीवन को अच्छा बना सकेगा।
प्रवचन के पश्चात् आचार्य भगवन ने उपस्थित धर्म सभा को आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि मनुष्य का अज्ञान है कि वह देह को अपना मान लेता है जिससे उसका भव खराब होता है। यदि व्यक्ति देह का उपयोग मोह को बढ़ाने के लिए करता है तो वह उसका अज्ञान है। उन्होंने मोह कर्म को जीतने के लिए पिण्ड को पराया जानना आवश्यक बताया।
मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘हम सब मिलकर प्रभु के चरणों नित उठ शीश नवाएं, जिनवर के गुण गाएं’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आचार्य भगवन के दर्शनार्थ आए दिल्ली, राजपुरा, सिरसा, लुधियाना, मेरठ, नादौन, होशियारपुर आदि जगहों के श्रद्धालु उपस्थित थे




