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विशिष्ट बनने के लिए आवश्यक है शिष्ट और अनुशासित जीवन : युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण

- ज्ञान की महता को गुरूदेव ने किया व्याख्यायित- रात्रिभोजन त्याग एवं जमीकंद त्याग के संदर्भ में पूज्यप्रवर द्वारा प्रेरणा

26.03.2026, गुरुवार, लाडनूं:योगक्षेम वर्ष के अवसर पर युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य से लाडनूं वासी नित्य अध्यात्म गंगा से अभिस्नात हो रहे है। एक साथ साधु साध्वियों की वृहद उपस्थिति से हर कोई लाभान्वित हो रहा है। सुदूर क्षेत्रों से भी श्रद्धालु भक्तों का आवागमन निरंतर जारी है।

मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में सुधर्मा सभा में जनमेदिनी को संबोधित करते हुए गुरुदेव ने कहा – जो व्यक्ति शिष्ट, शालीन और अनुशासित होता है, वही जीवन में विशिष्ट बन पाता है। गुरुदेव ने ज्ञान और विनय के अद्भुत समन्वय को समझाते हुए कहा कि विनीत शिष्य का शास्त्रीय ज्ञान सदैव पूजनीय होता है। केवल गुरु के प्रति ही नहीं, बल्कि ज्ञान और यथार्थ के प्रति भी हमारे भीतर गहरा विनय और समर्पण भाव होना चाहिए, क्योंकि विद्या विनय से ही शोभा पाती है। गुरुदेव ने फरमाया कि जिसके पास गहरा ज्ञान है उसे अपने ज्ञान का निरर्थक प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। एक आदर्श ज्ञानी वह है जो अपने ज्ञान का अहंकार नहीं करता।

गुरुदेव ने आगे फरमाया कि साधु अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का निर्दोष पालन कर ही महान द्युति वाला और अत्यंत तेजस्वी बनता है। महाव्रतों की तुलना एक माला से करते हुए गुरुदेव ने स्पष्ट किया कि यदि धागा टूट जाए तो पूरी माला के मणिए बिखर जाते हैं, ठीक उसी प्रकार किसी एक भी महाव्रत के टूटने से साधुपने की भूमिका खंडित हो जाती है। इन व्रतों का पालन करने वाला साधक इस नश्वर शरीर को त्यागकर शाश्वत सिद्ध या उच्च देवगति को प्राप्त होता है और देव जगत द्वारा भी पूजनीय बन जाता है। इस अवसर पर गुरुदेव ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को योगक्षेम वर्ष के प्रवास काल तक नवकारसी (सूर्योदय के एक मुहूर्त बाद तक कुछ भी न खाना-पीना) के सुगम तप को दैनिक जीवन में अपनाने की विशेष प्रेरणा दी। आचार्यश्री ने वहां उपस्थित साधु-साध्वियों, समणियों एवं श्रावक-श्राविकाओं को जैन विश्व भारती परिसर में प्रवास अवधि के दौरान रात्रि भोजन त्याग के साथ-साथ लहसुन, प्याज, आलू, शकरकंद व गाजर-मूली आदि जमीकंद के सर्वथा त्याग का संकल्प भी करवाया।

इस अवसर पर जैन विश्व भारती संस्थान के कुलपति बछराज जी दुगड़ ने बताया कि संस्थान के अनुशास्ता एवं अहिंसा यात्रा प्रणेता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण की पावन प्रेरणा से वर्तमान में युद्धरत देशों में शांति बहाली के प्रयास स्वरूप जैन विश्व भारती संस्थान की ओर से उन देशों को शांतिवार्ता हेतु एक लिखित संदेश और अनुरोध ईमेल के माध्यम से भेजा है। इस पहल का उद्देश्य, जैन विश्व भारती संस्थान के अहिंसा एवं शांति विभाग के माध्यम से, युद्ध के समाधान हेतु एक व्यावहारिक सुझाव उन देशों तक पहुंचाना है।

कार्यक्रम में जैन विश्व भारती द्वारा संचालित सेवाभावी आयुर्वेदिक रसायनशाला की वेबसाइट का अनावरण किया गया। जिसके संदर्भ में ट्रस्ट की ओर से विजयसिंह जी ने जानकारी प्रदान की

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