धुलेटी रंगोत्सव में झूम उठा सीरवी समाज, गैर-नृत्य और लूमर की रही धूम
42 बालक-बालिकाओं की ‘ढूंढ’ रस्म के साथ परंपराओं का हुआ निर्वहन,हजारों समाजबंधुओं की उपस्थिति में सांस्कृतिक एकता का संदेश

सूरत: रंगों का पावन पर्व धुलेटी सूरत में सीरवी समाज द्वारा हर्षोल्लास एवं पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ धूमधाम से मनाया गया। समाज भवन में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम की शुरुआत होली के दिन होली मंगला के साथ हुई तथा आज दिनांक 4 को धुलेटी रंगोत्सव के रूप में उत्सव संपन्न हुआ।
इस अवसर पर 42 बालक-बालिकाओं की पारंपरिक ‘ढूंढ’ रस्म संपन्न की गई। समाज के बंधु, महिलाएं एवं नवयुवकों ने रंगों की मस्ती में सराबोर होकर उत्साहपूर्वक भाग लिया। आईजी गैर मंडल द्वारा प्रस्तुत भव्य गैर नृत्य ने सभी का मन मोह लिया, वहीं महिलाओं ने लूमर एवं फाग गीतों की मधुर प्रस्तुति देकर वातावरण को भक्तिमय और आनंदमय बना दिया। गैर नृत्य पर उपस्थित जनसमूह ने तालियों की गूंज से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।

यह आयोजन केवल वार्षिक सम्मेलन ही नहीं, बल्कि समाज की आत्मा से जुड़ी एक जीवंत परंपरा भी है, जो वर्षों से समाज बंधुओं को एक सूत्र में बांधे हुए है। हजारों समाजबंधुओं की गरिमामयी उपस्थिति और सक्रिय सहभागिता ने यह सिद्ध कर दिया कि होली और धुलेटी समाज की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग हैं।
समाज अध्यक्ष हेमराज पंवार एवं सचिव भंवरलाल भायल ने सभी समाजबंधुओं को शुभकामनाएं प्रेषित की। इस अवसर पर उपाध्यक्ष महेंद्र सिंह राठौड़, कोषाध्यक्ष हेमराज मुलेवा, सह-कोषाध्यक्ष डायाराम सोयल, मगनाराम गहलोत, केसाराम काग, केसाराम वर्फा, बाबूलाल होंबड, दुर्गाराम पंवार एवं हरिराम भायल सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित रहे और अतिथियों का स्वागत किया। संजय राठौड़ ने बताया कि ऐसे सांस्कृतिक आयोजन समाज को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं तथा नई पीढ़ी को संस्कार प्रदान करते हैं। मीडिया प्रभारी पेमाराम सोयल ने जानकारी दी कि यह आयोजन समाज के सहयोग से प्रतिवर्ष समाज भवन में आयोजित किया जाता है, जिसमें आईजी गैर मंडल, नवयुवक मंडल, महिला मंडल एवं पूर्व पदाधिकारी बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। रंग-बिरंगे चेहरों और पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में सजे समाजबंधुओं की उपस्थिति देखते ही बन रही थी। दोपहर पश्चात सभी ने एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं और इसी के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। धुलेटी का यह रंगोत्सव समाज की एकता, संस्कृति और परंपरा का जीवंत प्रतीक बनकर यादगार बन गया।



