राजस्थानसामाजिक/ धार्मिक

उपलब्धियों से युक्त रहा आचार्यश्री भिक्षु का गृहत्याग जीवन : महातपस्वी महाश्रमण

आचार्यश्री ने आचार्यश्री भिक्षु के गृहत्याग जीवन को किया व्याख्यायित

-मुनि दिनेशकुमारजी ने निर्धारित विषय पर दी अभिव्यक्ति

18.12.2025, गुरुवार, कंटालिया, पाली (राजस्थान) :तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता महामना भिक्षु की जन्मस्थली कंटालिया में ‘आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष’ के महाचरण का आयोजन हो रहा है। तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में आयोजित इस महाचरण से पूरे गांव का वातावरण अध्यात्ममय बना हुआ है।

‘आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष’ के महाचरण का चतुर्थ दिवस। गुरुवार को भव्य एवं विशाल ‘भिक्षु समवसरण’ में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ के मध्य मंचासीन युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ आज के कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। मुनि धु्रवकुमारजी ने गीत का संगान किया। मुनि दिनेशकुमारजी ने आज के निर्धारित विषय पर अपनी अभिव्यक्ति दी।

शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित जनता को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि दो प्रकार की साधना बताई गई है- अगार धर्म और अनगार धर्म। गृह में रहते हुए धर्म की साधना करना अगार धर्म और गृहत्याग करके धर्म की आराधना करना अनगार धर्म हो सकता है। धर्म की साधना के आधार पर ये दो विभाग होते हैं। श्रावक जब सामायिक करता है, बारह व्रत की साधना करता है तो वह अगार धर्म होता है और जब व्यक्ति घर से अभिनिष्क्रमण कर दे और सर्व सावद्य त्याग स्वरूप साधुत्व स्वीकार कर ले तो वह अनगार धर्म की साधना हो सकता है।

आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के संदर्भ में कंटालिया में यह महाचरण का आयोजन हो रहा है। हम महामना के गृहस्थ जीवन में धर्म की साधना की। फिर उन्होंने गृह त्याग और किया और जैन धर्म के एक आम्नाय में दीक्षित हो गए। वे अपने गुरु के विश्वासपात्र हो गए। गुरु के शिष्य तो अनेक होते हैं, किन्तु सारे शिष्य गुरु के विश्वासपात्र नहीं हो सकते। ऐसे शिष्य जो कुछ ही समय में गुरु के लिए आलम्बन बन जाते हैं, उनकी विशेष प्रतिभा हो सकती है। उनकी गुरु के प्रति निष्ठा तो गुरु का भी शिष्य के प्रति निष्ठा हो सकती है। मुनि भीखणजी महाराज ने अपने गृह त्याग जीवन में अपने गुरु के पास रहते हुए अनेक ग्रन्थों व शास्त्रों का अध्ययन किया। उन्होंने कितना स्वाध्याय किया होगा। उनके चिंतन कितना जागरूकतापूर्ण था। वे तर्क आदि भी करते थे। ज्ञानार्जन में तार्किक स्वभाव का होना भी आवश्यक होता है। वे उस समुदाय के भावी आचार्य के रूप में अंकित होना भी उनके जीवन की उपलब्धि है। उससे भी बड़ी उपलब्धि थी कि वे इतनी ऊंची संभावना को प्राप्त करने के बाद भी क्रांति का निर्णय कर लेना भी बहुत बड़ी उपलब्धि है।

आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ मंे हाजरी के क्रम को संपादित करते हुए उपस्थित चारित्रात्माओं को अनेक प्रेरणाएं प्रदान कीं। आचार्यश्री की अनुज्ञा से प्रवचन पण्डाल में साधु, साध्वियों व समणियों को पंक्तिबद्ध होने की प्रेरणा प्रदान की और चारित्रात्माएं पंक्तिबद्ध हुए तो मानों मर्यादा महोत्सव जैसा दृश्य कंटालिया में उपस्थित हो गया। समस्त चारित्रात्माओं ने लेखपत्र का उच्चारण किया। आचार्यश्री के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने ‘हमारे भाग्य बड़े बलवान’ गीत का आंशिक संगान किया। सुश्री राजुल कांकरिया ने गीत का संगान किया। श्री प्रकाश गादिया ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।

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