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 सम्यक दृष्टि प्रदान करना सबसे बड़ा दृष्टि दान : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

 कषायों के अल्पिकरण हेतु गुरुदेव ने किया प्रेरित

लाडनूं :जैन विश्व भारती, लाडनूं का सुरम्य परिसर इन दिनों अपार आध्यात्मिक उल्लास और गुरुभक्ति से सराबोर है। ‘योगक्षेम वर्ष’ के मंगल प्रवास के दौरान अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन जन्मोत्सव एवं आचार्य पदारोहण के प्रसंग पर हर्षोल्लास संपूर्ण चतुर्विध धर्मसंघ में छाया हुआ है। इन ऐतिहासिक और गौरवशाली प्रसंगों के उपलक्ष्य में विशाल सुधर्मा सभा में साधु-साध्वियों व समणियों द्वारा अपने आराध्य के श्रीचरणों में विशेष श्रद्धाभिव्यक्ति और मनोहारी प्रस्तुतियों का क्रम आज भी निरंतर जारी रहा। इसी भव्य और भक्तिमय वातावरण के बीच प्रज्ञा गीत से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।

सुधर्मा सभा में संबोधित करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अपने प्रवचन में विवेक और आध्यात्मिक दृष्टि का महत्व बताते हुए कहा कि जीवन में बाहरी आंखों का बड़ा महत्व है और लोग मृत्यु के बाद नेत्र दान भी करते हैं। लेकिन लोकोत्तर संदर्भ में किसी को आध्यात्मिक दृष्टि देना या सम्यक दृष्टि बना देना सबसे बड़ा दृष्टि दान है। किसी मिथ्या दृष्टि को सम्यक दृष्टि बना देना और अव्रती को व्रती या संयमी बना देना बहुत बड़ा उपकार होता है। जिसके पास न तो खुद का जागा हुआ विवेक है और न ही वह विवेकशील लोगों की संगति करता है, वह व्यक्ति वास्तव में अंध है और उसके गलत मार्ग पर जाने की पूरी संभावना रहती है। गुरुदेव ने समझाया कि विवेक का वास्तविक अर्थ है कि अपने कषायों अर्थात क्रोध, मान, माया, लोभ को स्वयं से पृथक करना। यद्यपि एक साथ कषायों से पूरी तरह मुक्ति पाना हर किसी के लिए तत्काल संभव नहीं है, फिर भी हमें इनका अल्पीकरण करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए।                                         

सामूहिक जीवन और आपसी व्यवहार के संदर्भ में गुरुदेव ने आगे कहा कि साथ रहते हुए कभी-कभी कषाय का योग बन जाता है, थोड़ी कहा-सुनी या गुस्सा भी आ सकता है, लेकिन इसे मन में गांठ बांधकर नहीं रखना चाहिए। अगर किसी बात पर मतभेद हो जाए, तो अगले दिन सुबह तक उसे समाप्त कर वापस वैसे के वैसे सामान्य हो जाना चाहिए। यदि किसी बड़े को सुधार के लिए छोटों को डांटना या कड़ा कहना पड़े, तो बाद में उनके मन की पीड़ा दूर करने और उन्हें वात्सल्य से संभालने का प्रयास भी करना चाहिए, ताकि वे आहत न हों और उत्साह से विकास करते रहें। इसके साथ ही, गुरुदेव ने साधु-साध्वियों को विशेष प्रेरणा दी कि हमें जो यह महान साधुपन मिला है, जीवन के अंतिम श्वास तक इसकी अखंड रूप से सुरक्षा होनी चाहिए। अतः हम सभी अप्रमत्त रहते हुए, अपनी आत्मा की रक्षा के साथ-साथ क्षेत्रों में धार्मिक उपकार करने का निरंतर प्रयास करें।                                                                                                                                             

आराध्य की अभिवंदना के क्रम में आज मुनि विनोद कुमार जी, साध्वी सुश्रुत प्रभा जी, साध्वी स्वर्ण रेखा जी, समणी अमल प्रज्ञा जी, मुनि आर्ष कुमार जी, मुनि रजनीश कुमार जी, साध्वी चरितार्थ प्रभा जी, साध्वी मेघ प्रभा जी, साध्वी काम्य प्रभा जी, समणी विपुल प्रज्ञा जी, मुनि निकुंज कुमार जी, साध्वी धन्य प्रभा जी, साध्वी तेजस्वी प्रभा जी, साध्वी अनन्य प्रभा जी, समणी संगीत प्रज्ञा जी, मुनि आर्जव कुमार जी, साध्वी अक्षय प्रभा जी, साध्वी प्रीति प्रभा जी, साध्वी अक्षय विभा जी, मुनि नम्र कुमार जी, सरदारशहर साध्वी वृंद, साध्वी पद्म प्रभा जी, साध्वी मंदार प्रभा जी, मुनि हेमऋषि जी, साध्वी श्रेष्ठ प्रभा जी, साध्वी माधुर्य प्रभा जी, साध्वी सुधांशु प्रभा जी, साध्वी जगवत्सला जी, साध्वी चारूलता जी, साध्वी कीर्तिप्रभा जी, साध्वी रक्षितयशा जी, साध्वी युक्तिप्रभा जी, साध्वी प्रसन्नयशा जी, साध्वी आगमप्रभा जी तथा मुनि अमन कुमार जी सहित अनेकों ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति प्रस्तुत की।

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