
सूरत। सूरत में सामने आए 600 करोड़ रुपये के फर्जी बिलिंग घोटाले ने एक बार फिर जीएसटी विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि लंबे समय से बंद पड़ी कई शेल कंपनियों में अचानक एक ही महीने के भीतर करोड़ों रुपये का टर्नओवर दिखाकर करीब 110 करोड़ रुपये की इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) उठा ली गई। जानकारों का कहना है कि यह घोटाला केवल फर्जी कंपनियों के सहारे संभव नहीं था, बल्कि इसमें जीएसटी अधिकारियों की घोर लापरवाही या संभावित मिलीभगत भी सामने आ रही है।
दरअसल, गुजरात में लगातार सबसे ज्यादा बोगस बिलिंग के मामले सामने आने के बाद कुछ समय पहले विभाग ने सख्त निर्देश जारी किए थे। आदेश था कि नई कंपनियां यदि नील रिटर्न भर रही हों तो उनकी मौके पर जांच की जाए, स्थल निरीक्षण रिपोर्ट तैयार की जाए, फोटो अपलोड किए जाएं और कंपनी के वास्तविक कारोबार की जानकारी भी पोर्टल पर दर्ज की जाए। इतना ही नहीं, यदि कोई कंपनी या कारोबारी लगातार छह महीने तक रिटर्न दाखिल नहीं करे, तो उसका जीएसटी नंबर सस्पेंड कर दिया जाए।
लेकिन सूरत के इस बड़े घोटाले ने साबित कर दिया कि ये सारे आदेश केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह गए। आरोप है कि जिन कंपनियों पर समय रहते कार्रवाई होनी चाहिए थी, वे बंद होने के बावजूद सिस्टम में सक्रिय रहीं और करोड़ों का फर्जी कारोबार दिखाकर सरकार को 100 करोड़ रुपये से ज्यादा का चूना लगा गईं।
हालांकि जीएसटी विभाग ने घोटाले का खुलासा कर अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश की है, लेकिन सवाल यह है कि जब कंपनियां महीनों से निष्क्रिय थीं, तब उन पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई। व्यापार जगत और जानकारों का मानना है कि अब केवल फर्जी फर्म संचालकों पर कार्रवाई काफी नहीं है, बल्कि उन जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए, जिनकी लापरवाही या मिलीभगत से इतना बड़ा घोटाला संभव हुआ।




