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धर्म के विधान से संचालित हो राजनीति : युगप्रधान अनुशास्ता महाश्रमण

आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को किया उत्तरित-अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर भी आचार्यश्री ने दी लोगों को मंगल प्रेरणा

21.06.2026, रविवार, लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान समय में लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास कर रहे हैं। इस कारण वर्ष भर में आयोजित होने वाले समस्त कार्यक्रम इसी परिसर में सुसम्पन्न हो रहे हैं। 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में ख्यापित किया गया है। इस संदर्भ में भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में हजारों-हजारों लोगों ने सामूहिक रूप से योगाभ्यास किया तो वहीं आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय में भी अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर सामूहिक योगाभ्यास का आयोजन किया गया, जिसमें युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने स्वयं पहुंचकर लोगांे को मंगल प्रेरणा प्रदान की।
तदुपरान्त नित्य की भांति सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘अनाथों के नाथ बनो’ को आगम के माध्यम से विवेचित करते हुए कहा कि राजा श्रेणिक और अनाथी मुनि का संवाद हुआ। एक तरफ एक धर्म जगत का व्यक्तित्व और दूसरी ओर राजनीति के क्षेत्र का व्यक्तित्व मानों राजनीति और धर्मनीति दोनों आसपास स्थित हो गई।
राजनीति राष्ट्र के लिए आवश्यक होती है, किन्तु राजनीति पर भी धर्म का प्रभाव बना रहे। राजनीति धर्म के विधान से संचालित हो। राजनीति में भी गुणवत्ता बनी रहे। अहिंसा, नैतिकता, सद्भावना, निष्पक्षता भी राजनीति में रहे, ऐसा प्रयास होना चाहिए। कई बार धर्मगुरुओं से राजनीति के लोगों को सद्प्रेरणा मिल सकती है। राजनीति में स्वार्थ की भावना, अनैतिकता, पक्षपातता वाली बात न हो। अपराध करने वालों को सजा देने का कार्य न्यायपालिका की होती है। राजनीति के लिए दो प्रणालियां होती हैं- एक लोकतांत्रिक प्रणाली और दूसरी राज प्रणाली। दोनों का लक्ष्य एक ही होती है कि प्रजा सुखी रहे, सबकी सुरक्षा हो, देश-प्रदेश सुखी रहे। कार्य अच्छे ढंग से हो, उसके लिए शासन-प्रशासन की आवश्यकता भी होती है। एक समय था, जब चक्रवर्ती, वासुदेव, प्रति वासुदेव आदि की व्यवस्था भी थी। आज वर्तमान समय में लोकतांत्रिक प्रणाली चल रही है। जनता के द्वारा, जनता के लिए और जनता पर शासन की बात आती है। इसके लिए समय-समय पर चुनाव भी होता है। जनता अपने प्रतिनिधि का चुनाव करती है। जनता की अच्छी सेवा करने वाले को जनता दुबारा भी चुन सकती है। यदि राजा या राजनैतिक व्यक्ति पद पर आने के बाद भी अच्छा कार्य नहीं करता, उसका जन्म मानों उसी प्रकार निरर्थक हो जाता है, जिस प्रकार बकरी के गले में लटका हुआ स्तन। अनाथों का नाथ बनने की बात तो आदमी को अपनी ओर से षडजीव निकायों को न मारने का त्याग हो तो सभी जीवों का नाथ बना जा सकता है। जो मुनि अहिंसा महाव्रत के पालक होते हैं, वे मानो अनाथों के नाथ बन जाते हैं। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओ के उत्तर प्रदान किए।

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