
सूरत। सूरत महानगरपालिका में लगातार सातवीं बार भारतीय जनता पार्टी का बोर्ड गठित होने की संभावना के बीच मेयर सहित प्रमुख पदाधिकारियों के चयन को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। एक-दो दिन में नवनिर्वाचित सदस्यों के नामों का गजट प्रकाशन होने की संभावना है, जिसके बाद आगामी सप्ताह अथवा मई माह के तीसरे सप्ताह की शुरुआत में सूरत सहित राज्य की सभी 15 महानगरपालिकाओं, जिला पंचायतों, तालुका पंचायतों और नगरपालिकाओं में, जहां भाजपा को बहुमत मिला है, नए बोर्ड के गठन की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
इसी क्रम में प्रदेश भाजपा द्वारा पहली बार मेयर, डिप्टी मेयर, स्थायी समिति अध्यक्ष सहित अन्य पदाधिकारियों और समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति से पहले रायशुमारी (सेंस प्रक्रिया) शुरू की गई है। इसके तहत प्रदेश भाजपा के तीन पर्यवेक्षकों की टीम सूरत पहुंच रही है, जो आज सुबह 10:30 बजे से शहर भाजपा कार्यालय में विभिन्न पदों के संभावित नामों पर संगठन और निर्वाचित प्रतिनिधियों की राय लेगी।
रायशुमारी के दौरान शहर भाजपा अध्यक्ष सहित प्रमुख पदाधिकारी, मोर्चा अध्यक्ष-महामंत्री, विधायक, सांसद, प्रदेश स्तर के पदाधिकारी तथा 115 नवनिर्वाचित पार्षदों से चर्चा की जाएगी। जानकारी के अनुसार प्रत्येक वार्ड को अलग-अलग समय दिया गया है और संबंधित वार्ड के चारों पार्षदों के साथ वार्ड अध्यक्ष एवं महामंत्रियों को एक साथ बुलाकर उनकी राय सुनी जाएगी। अधिकांश वार्ड संगठनों ने इस प्रक्रिया को लेकर पूर्व समन्वय भी कर लिया है।
सूत्रों के अनुसार पर्यवेक्षक विधायक और सांसदों के साथ अलग से वन-टू-वन बैठक भी कर सकते हैं, जिसके बाद शहर संगठन, जनप्रतिनिधियों और पर्यवेक्षकों की संयुक्त समन्वय बैठक आयोजित होने की संभावना है। बताया जा रहा है कि उम्मीदवार चयन के दौरान अपनाई गई प्रणाली को ही पदाधिकारियों के चयन में भी लागू किया जा सकता है।
समन्वय बैठक के बाद पर्यवेक्षक प्रत्येक पद के लिए दो से तीन नामों की पैनल तैयार कर सकते हैं। राज्यभर से प्राप्त पैनलों के आधार पर आगामी सप्ताह की शुरुआत में प्रदेश भाजपा की पार्लियामेंट्री बोर्ड की बैठक आयोजित होने की संभावना है, जिसमें अंतिम निर्णय लिया जाएगा। प्रदेश भाजपा द्वारा पहली बार अपनाई गई रायशुमारी प्रक्रिया के कारण मेयर और अन्य पदों के दावेदारों के राजनीतिक समीकरणों में बदलाव संभव माना जा रहा है। अब तक स्थानीय विधायकों का प्रभाव प्रमुख माना जाता रहा है, लेकिन इस बार सांसदों और संगठनात्मक सिफारिशों का भी निर्णायक महत्व रहने की संभावना जताई जा रही है।



