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अनित्य है मानव जीवन : मानवता के मसीहा महाश्रमण

-आचार्यश्री ने ‘जीवन की अनित्यता’ विषय को किया विवेचित-चारित्रात्माओं को उत्तरज्झयणाणि आगम के दसवें अध्ययन को कंठस्थ करने का कराया संकल्प-अनेक चारित्रात्माओं ने आज भी अपने आराध्य को किया वर्धापित

04.05.2026, सोमवार, लाडनूं :जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले, सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की अलख जगाने वाले, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी के श्रीमुख से निरंतर प्रवाहित होने वाली ज्ञानगंगा मानों रेतीली धरती को अभिसिंचित कर रही है। योगक्षेम वर्ष प्रवास के दौरान आचार्यश्री प्रतिदिन एक निर्धारित विषय को विवेचित कर लोगों को आध्यात्मिक प्रेरणा प्रदान करते हैं। इसके साथ-साथ आचार्यश्री प्रायः नित्य प्रति चारित्रात्माओं आदि की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान कर उन्हें आत्मतोष प्रदान करते हैं।

सोमवार को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘जीवन की अनित्यता’ को विवेविचत करते हुए कहा कि पर्याय रहित द्रव्य किसी ने देखा है क्या और द्रव्यरहित पर्याय किसी ने देखा है क्या? जैन दर्शन का सिद्धांत है कि पर्यायहीन द्रव्य नहीं हो सकता है तो द्रव्यविहीन पर्याय भी नहीं रह सकता। पर्याय द्रव्य में ही हो सकता है। अर्थ यह होता है कि द्रव्य और पर्याय दोनों साथ रहते हैं। जैन धर्म में नित्यानित्यवाद भी सम्मत है। द्रव्य में पर्याय का परिवर्तन होता है। आत्मा अचल और शाश्वत है।

शरीर एक पर्याय है, इसलिए यह नश्वर है। आत्मा के प्रदेश नहीं बिखरते और आकाशास्तिकाय की दृष्टि से देखें तो आकाश नित्य भी है और पर्याय में परिवर्तन हो सकता है। इसलिए जैन दर्शन नित्यानित्यवाद को मानने वाला है। मनुष्यों का जीवन अनित्य होता है। जिस प्रकार वृक्ष का पके हुए पान का पत्ता गिर जाता है, उसकी प्रकार मानव जीवन एक निश्चित समय पर गिर कर समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार कुशाग्र के अग्र भाग पर स्थित ओस बिन्दु भी कुछ ही समय के लिए होता है, इसलिए मनुष्य का जीवन अनित्य ही होता है।

अनित्य जीवन को ध्यान में रखते हुए चारित्रात्माओं को धर्म, ध्यान, साधना, आराधना, संयममय जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। जितना संभव हो सके, समय का सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने साधु-साध्वीवृंद और समणीवृंद से उत्तरज्झयणाणि आगम के दसवें अध्ययन को योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत कंठस्थ करने और जिन्हें कंठस्थ है, उन्हें एक बार प्रतिदिन चिताड़ने की प्रेरणा देते हुए इच्छुक चारित्रात्माओं को दसवें अध्ययन को कंठस्थ करने का संकल्प संस्कृत भाषा में कराया।

 

मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को जिज्ञासा प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया तो चारित्रात्माओं ने अपनी जिज्ञासाएं प्रस्तुत कीं, जिसे आचार्यश्री ने उत्तरित किया। आचार्यश्री की अनुज्ञा से साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने गुरुदेव तुलसी के गीत का आंशिक संगान किया।

आचार्यश्री के जन्मोत्सव व पट्टोत्सव पर चारित्रात्माओं की अभ्यर्थना का ऐसा अनवरत क्रम-सा चल रहा है, जो अभी भी जारी है। प्रतिदिन कुछ चारित्रात्माएं अपने आराध्य को वर्धापित कर रहे हैं। इस क्रम में आज साध्वी रोहिणीप्रभाजी, अहमदाबाद से दीक्षित साध्वीवृंद, शैक्ष साध्वीवृंद, मुनि आगमकुमारजी, साध्वी वर्धमानश्रीजी, मुनि अनेकांतकुमारजी, साध्वी रोशनीप्रभाजी ने अपनी-अपनी प्रस्तुति दी।

आचार्यश्री ने श्रीडूंगरगढ़ के पारख परिवार को आध्यात्मिक संबल प्रदान करते हुए परिजनों को मंगल प्रेरणा प्रदान की। इस संदर्भ में साध्वीप्रमुखाजी का भी उद्बोधन हुआ।

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