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संतोष व संयम का हो विकास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

तृष्णा की दुष्पुरता’ विषय को आचार्यश्री ने किया वर्णित,चारित्रात्माओं की जिज्ञासाएं भी हुई समाहित,बहिर्विहार से गुरु सन्निधि में पहुंची साध्वियों ने दी भावाभिव्यक्ति

21.04.2026, मंगलवार, लाडनूं : जन-जन के मानस को आध्यात्मिक शांति प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान में लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास कर रहे हैं। मंगलवार को सुधर्मा सभा में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘तृष्णा की दुष्पूरता’ पर पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि प्राणी के भीतर वृत्तियां होती हैं। उनमें सद्वृत्तियां भी होती हैं तो दुष्वृत्तियां भी होती हैं। वृत्ति से प्रेरित होकर आदमी प्रवृत्ति करता है। कार्य अच्छा हो अथवा बुरा, जैसी वृत्ति मन के भीतर उभरती है, आदमी वैसे कार्य में लग जाता है। बुरी वृत्ति उभरती है तो बुरे कार्यों में लग जाता है और सद्वृत्ति के भाव उभरते हैं तो आदमी सद्कार्यों में प्रवृत्त हो जाता है।

दुष्वृत्तियों के मूल में देखें तो राग और द्वेष मुख्य हैं। आदमी अगर इसका विस्तार करे तो क्रोध, मान, माया, लोभ आदि-आदि अनेक दुर्वृत्तियां होती हैं। इनमें लोभ भी एक दृर्वृत्ति होती है जो सबसे अंतिम में नष्ट होने वाली बुरी वृत्ति होती है। तृष्णा मानों लोभ का ही रूप है। तृष्णा को धरना बड़ा मुश्किल होता है। लोभ अथवा तृष्णा की प्रवृत्ति वाले आदमी को यदि पूरी दुनिया का धन-संपदा दे दी जाए तो भी उसका लोभ समाप्त नहीं हो सकता। इसलिए यह कहा जा सकता है कि उस आदमी की आत्मा दुष्पूर है।

कहा गया है कि ज्यों-ज्यों लाभ होता है, त्यों-त्यों लोभ की वृद्धि होती है। हालांकि इस जीवन में गृहस्थ के पास परिग्रह न हो तो कठिनाई वाली बात हो जाती है और साधु के पास परिग्रह हो तो कठिनाई वाली बात हो जाती है। इस माया और लोभ रूपी जाल से जो बच जाता है, वह साधु होता है। साधारण मनुष्य को भी लोभ की ज्यादा वृत्ति से बचने का प्रयास करना चाहिए। साधु को संतोष तो धारण करना ही चाहिए, गृहस्थ आदमी को भी अपने जीवन में संतोष का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। जितना संभव हो सके, दान करना चाहिए, त्याग करना चाहिए और भोगों का अल्पीकरण करने का प्रयास करना चाहिए। इस मानव जीवन को अच्छा बनाने के लिए त्याग और संयम का विकास होना आवश्यक बताया गया है।

आचार्यश्री के मंगल प्रवचन से पूर्व कार्यक्रम के शुभारम्भ में साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को कुछ समय तक ध्यान का प्रयोग भी कराया। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को समाहित किया।

प्रेक्षाध्यान शिविर के शिविरार्थियों को आचार्यश्री ने उपसंपदा प्रदान की। साध्वी सूर्ययशाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। साध्वी निर्मलयशाजी ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया। पूज्यप्रवर ने इस संदर्भ में आचार्यश्री ने मंगल प्रेरणा प्रदान की। साध्वी गवेषणाश्रीजी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया।

 

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