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भगवान महावीर का तीर्थ तिराने वाला है-आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा.

20 सितम्बर 2025, आत्म भवन, बलेश्वर, सूरत।आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि पंचम काल में हमें मानव जन्म मिला और भगवान महावीर का जैन धर्म मिला है, जिसमें अस्तित्व के बोध की बात होती है, यानि आत्मा को जानना। जिसे अपने अस्तित्व का बोध हो जाता है तो वह इस संसार सागर से पार हो सकता है। व्यक्तित्व शरीर का नाम है उसे सभी याद करते हैं, किंतु जो भीतर अस्तित्व है, जिसके द्वारा पूरा शरीर गतिशील रहता है, जो दिखाई नहीं देता है उसे याद करें यानि ध्यान साधना करें तो संसार सागर पार करने का राजमार्ग मिल जाता है।उन्होंने आगे फरमाया कि व्यक्ति चौबीस घंटे में कितनी देर तक स्वयं में स्थित रहता है इसका अवलोकन करें, यदि चौबीस घंटे में एक या दो घंटे भी निज आत्मा को दे दिया तो इस जीवन का कल्याण हो सकता है और अगला भव भी सुधर सकता है।उन्होंने यह भी फरमाया कि व्यवहार जगत में परिवार में रहना पड़ता है, किंतु परिवार में रहते हुए भी अपनी आत्मा के कल्याण के लिए आत्मा की साधना करें। भगवान महावीर के 1 लाख 59 हजार श्रावकों में दस श्रावकों ने अणुव्रत धारण कर मोक्ष को प्राप्त किया। जिसमें जानबूझकर हिंसा नहीं करना। जानबूझकर झूठ नहीं बोलना। बिना दी हुई कोई वस्तु ग्रहण नहीं करना, मर्यादा में रहना एवं अपने धन-माल सम्पत्ति की मर्यादा करना है, जो। जो इन अणुव्रतों को ग्रहण करता है वह भगवान महावीर के तीर्थ में आ जाता है। तीर्थ तिराने वाला है।

साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका ये चारों तिरने वाले हैं।प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार की चर्चा करते हुए फरमाया कि मन, बुद्धि, चित्त के बिना संसार रूक जाता है, इसके लिए भेद विज्ञान की साधना आवश्यक है। जब जीव अलिप्त रहता है तो कर्मों का बंधन नहीं होता चित्त में समाधि रहनी चाहिए। समाधि का नाम ही समाधान है जो अष्टगुणों से युक्त आत्मा है और असमाधि का कारण है आने वाले कर्मों, पुद्गलों की चाहना रखना। क्रिया-प्रतिक्रिया बुद्धि के स्तर पर रहते हैं, किंतु चित्त समाधि उसी के रहेगी जो भेदज्ञानी होगा। आत्मा के पास आनन्द शांति सुख है। यह जीव जबसे संसार में भ्रमण किया तब से हैं जब सिद्धसिला जाएगा तब भी था और सब जगह रहेगा, अनुभव में असमाधि के कारण नहीं आ रहा है। जो जैसा है, वैसा उसे स्वीकार कर लेता है इसी का नाम सम्यक दर्शन है।युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा ने ‘‘रूत आज की है प्यारी’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।आत्मार्थी श्री शौर्य मुनि जी म.सा. ने भी अपनी भावनाएं व्यक्त की।आज कड़ोदरा से श्रीमती भावना शाह ने 8 उपवास का प्रत्याख्यान लिया, तपस्वी का फाउण्डेशन की ओर शॉल, माला, स्मृति चिन्ह द्वारा सम्मान किया।आज गुड़गांव, बैंगलोर, हैदराबाद, रोपड़, अजमेर, मालेगांव आदि जगहों से श्रद्धालुगण आचार्य श्री जी के दर्शन हेतु उपस्थित हुए।

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