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अप्रमत्त को नहीं होता है भय : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

तेरापंथ प्रबोध व उसके व्याख्यान से भी लाभान्वित हुई जनता

युगप्रधान आचार्यश्री ने भय के कारणों को किया व्याख्यायित

-तेरापंथ प्रबोध व उसके व्याख्यान से भी लाभान्वित हुई जनता

17.07.2025, गुरुवार, कोबा, गांधीनगर

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ अहमदाबाद के चतुर्मास के लिए कोबा स्थित प्रेक्षा विश्व भारती में विराजमान हो चुके हैं। देश-विदेश से श्रद्धालु इस चतुर्मास का लाभ उठाने को पहुंच गए हैं। इस कारण प्रेक्षा विश्व भारती वर्तमान समय में जनाकीर्ण बनी हुई हैं। अहमदाबाद चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति से जुड़े कार्यकर्ता चतुर्मास को सुन्दर से सुन्दरतम बनाने के लिए दिन-रात जुटे हुए हैं। अपने आराध्य के निकट सेवा, दर्शन व उपासना का अवसर कोई भी कार्यकर्ता खोना नहीं चाहता। इसके साथ तेरापंथ समाज की अनेक संस्थाओं, संगठनों आदि के वार्षिक अधिवेशन, प्रशिक्षण कार्यशालाएं व शिविर आदि का शुभारम्भ हो चुका है। आचार्यश्री भी नियमित रूप से प्रातःकालीन भ्रमण के दौरान कुटिरों आदि में रहने वाले लोगों को अपने दर्शन से लाभान्वित बना रहे हैं।

गुरुवार को ‘वीर भिक्षु समवसरण में उपस्थित श्रद्धालु जनता को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘आयारो’ आगम के माध्यम से पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि भय और प्रमाद का संबंध है और अभय तथा अप्रमाद का भी संबंध है। शास्त्र में बताया गया है कि प्रमत्त को सब ओर से भय होता है और अप्रमत्त को किसी भी ओर से भय नहीं होता। प्रश्न हो सकता है कि प्रमत्त किसे कहा जाता है? उत्तर दिया गया कि प्रमत्त उसे कहा जाता है जो कषायों से दबा हुआ हो। कषाय- गुस्सा, अहंकार, माया और लोभ अथवा थोड़े में राग-द्वेष भी कह सकते हैं। जो राग में होता है और जो द्वेष में होता है, कषाय से युक्त होता है, वह प्रमत्त होता है। जो द्वेष से आक्रांत है, उसे भी भय होता है। जिसके भीतर गुस्सा, अहंकार, माया और लोभ नहीं है, राग-द्वेष की भावना नहीं है, उसे कोई भय नहीं होता है।

कषाय और राग-द्वेष के दो रूप होते हैं- एक सुसुप्त अवस्था का कषाय और एक जागृत अवस्था का कषाय। वर्तमान समय में साधु हो अथवा गृहस्थ सभी में मोहनीय कर्म का प्रभाव होता है। मोह कर्म के संयोग से योग अशुभ और मोह कर्म के वियोग से योग शुभ होते हैं। प्रवचन में उपस्थित साधु, अथवा श्रावक का कषाय सुसुप्तावस्था में और अन्य कार्यों में लगा गृहस्थ के भी कषाय जागृत अवस्था में हो जाता है। जो प्रमत्त होता है, उसे सभी ओर से भय होता है। किसी के पास ज्यादा धन होता है तो आदमी के मन में उसे चोरी होने का भय आ जाता है। यह राग भाव के कारण भय होता है। कहीं लोभ है तो भी आदमी को भय होता है। किसी के प्रति राग और किसी के प्रति द्वेष की भावना होती है तो भी आदमी को भय होता है। जो आदमी गलती करता है, उसे भय होता है, लेकिन जो परिग्रह नहीं रखता, किसी से कोई द्वेष न हुआ हो तो भी अभय रह सकता है। इसलिए शास्त्र में बताया गया कि प्रमादी को चारों ओर से भय और अप्रमत्त को कोई भय नहीं हो सकता।

आदमी को जितना संभव हो सके, प्रमाद से बचने का प्रयास करना चाहिए। भय न हो इसलिए के लिए आदमी यह भी ध्यान रखे कि उसे दूसरों को भयभीत करने से बचने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के उपरान्त ‘तेरापंथ बोध’ का संगान कर उसे व्याख्यायित भी किया। इस प्रकार प्रेक्षा विश्व भारती में उपस्थित श्रद्धालुओं को अपने आराध्य के श्रीमुख से अध्यात्म की मानों दोगुनी खुराक प्राप्त हो रही है।

 

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