श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में कृष्ण बाल लीलाओं का वर्णन, श्रद्धालुओं ने लिया भक्ति रस का आनंद
भागवताचार्य राधेश्याम शास्त्री ने सुनाए श्रीकृष्ण की लीलाओं के प्रसंग, गौ सेवा और सनातन संस्कृति के संरक्षण का दिया संदेश

सूरत। श्री शक्ति धाम सेवा समिति द्वारा श्री राणी सती दादी मंदिर के रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन शनिवार को श्रद्धालुओं ने भक्ति और आध्यात्मिक रस का आनंद लिया। सिटी लाइट स्थित महाराजा अग्रसेन पैलेस के पंचवटी हॉल में आयोजित कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

कथा प्रारंभ होने से पूर्व मुख्य यजमान परिवार द्वारा व्यासपीठ का पूजन एवं आरती की गई। आयोजन समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने भागवताचार्य राधेश्याम शास्त्री का माल्यार्पण कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। समिति ने बताया कि कथा विश्राम के बाद रात्रि 8 बजे भजन संध्या का आयोजन भी किया गया। रविवार को कथा में महारास लीला, कंस वध, उद्धव प्रसंग, रुक्मिणी विवाह एवं फूलों की होली जैसे दिव्य प्रसंगों का वर्णन किया जाएगा, जबकि सोमवार को कथा का अंतिम सत्र प्रातः 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक आयोजित होगा।
व्यासपीठ से कथा का रसपान कराते हुए भागवताचार्य राधेश्याम शास्त्री ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, कालिया मर्दन, श्रीगिरिराज पूजन तथा छप्पन भोग के प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने बताया कि नंद बाबा ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर लाखों गायों सहित सोने-चांदी का दान किया और संपूर्ण गोकुल उत्सव में डूब गया। कंस द्वारा भेजे गए पूतना, बकासुर सहित अनेक राक्षसों का भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धार कर धर्म की स्थापना का संदेश दिया।
भागवताचार्य ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को दूसरों की कमियों को देखने के बजाय आत्मचिंतन कर अपने भीतर के विकारों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने गौ सेवा का महत्व बताते हुए कहा कि गौ माता के चरणों में सभी तीर्थों का वास होता है और उनकी सेवा से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।

उन्होंने पूतना प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि विष पिलाने के उद्देश्य से आई पूतना का भी भगवान ने उद्धार कर दिया, क्योंकि भगवान करुणा और प्रेम के सागर हैं। गोपियां भी माखन चोरी की शिकायत का बहाना बनाकर श्रीकृष्ण के दर्शन करने पहुंचती थीं। उन्होंने श्रद्धालुओं से ब्राह्मणों और साधु-संतों का सम्मान करने का आह्वान करते हुए कहा कि इनके प्रति दुर्व्यवहार करने से पुण्य का क्षय होता है।
कथा के दौरान उन्होंने वर्तमान सामाजिक परिवेश पर भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि संस्कृति किसी भी समाज की पहचान होती है और अपनी परंपराओं एवं संस्कारों का संरक्षण करना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है। जन्मदिन जैसे अवसरों पर दीप प्रज्वलन, अन्नदान और गौ सेवा करने का संदेश देते हुए उन्होंने सेवा और संस्कार को जीवन का आधार बनाने का आह्वान किया। साथ ही उन्होंने कहा कि बच्चों के चरित्र निर्माण और संस्कारवान बनाने में माता-पिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।


