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साधु से बड़ा दानवीर कोई नहीं : सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्यश्री ने ‘अभयदाता बनो’ विषय को किया व्याख्यायित

05.06.2026, शुक्रवार, लाडनूं :जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शुक्रवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘अभयदाता बनो’ के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि मानव जीवन में शिकार को भी एक व्यसन माना गया है। सात व्यसन बताए गए हैं-जुआ, मांसाहार, मदिरापान, चोरी आदि सात प्रकार के व्यसन बताए गए हैं। उन व्यसनों में एक प्रकार का व्यसन शिकार को भी बताया गया है। आदमी को इस व्यसन से बचने का प्रयास होना चाहिए।

शास्त्र में शिक्षा दिया गया है कि प्रत्येक आदमी को अपनी ओर से सभी प्राणियों को अभयदान देने का प्रयास करना चाहिए। दुनिया में अनेक प्रकार के दान चलते हैं। कोई अन्न का दान करता है, कोई वस्त्र दान करता है, कोई औषधि का दान करता है, कोई ज्ञान का दान करता है। ज्ञान भी दान की एक चीज होती है। कोई धन का भी ध्यान देता है। इसी प्रकार एक दान है-अभयदान। अभय प्रदान कर देना श्रेष्ठ देना होता है। दुनिया में दानवीर लोग मिल सकते हैं। संसार के सभी दानवीर मानों साधु के सामने छोटे होते हैं। कोई आदमी किसी को कितना दान दे, लेकिन साधु तो छह काय के जीवों को अभयदान देने वाला होता है। उससे बड़ा कोई दानी नहीं हो सकता। साधु से बड़ा दानवीर कोई गृहस्थ नहीं हो सकता। साधु अपने से छोटे से प्राणी की भी हिंसा न हो, इसका प्रयास करता है। साधु का यह धर्म है कि साधु किसी की जानबूझकर आसातना करे ही क्यों? गलती से किसी को पांव भी लग जाए तो खमतखामणा करनी होती है।

साधु स्वयं अभय का दान देते हुए गृहस्थों को भी अभयदान देने की प्रेरणा देता है। गृहस्थ भी अपने जीवन में जितना संभव हो सके, अभय का दान देने का प्रयास करे। गृहस्थ पूरी तरह अहिंसक न भी हो सके, लेकिन शिकार के रूप में तो किसी प्राणी की हिंसा से सर्वथा बचने का प्रयास करना चाहिए। यह संसार अनित्य है, इसलिए हिंसा में आसक्त होने से बचने का प्रयास करना चाहिए। जितना संभव हो सके, अपनी ओर से प्राणियों को अभयदान देने का प्रयास करना चाहिए।

आदमी अहिंसा की साधना का प्रयास करे, लेकिन शौर्य, वीर्ययुक्त अहिंसा का पालन करने का प्रयास हो। डरपोक वाली अहिंसा नहीं, मारने की क्षमता हो, किन्तु वह किसी प्राणी को अभय का दान प्रदान कर दे, वैसी अहिंसा का पालन होना चाहिए। अहिंसक आदमी को न तो किसी से डरना और न ही किसी को डराना। इस प्रकार आदमी को अपने जीवन में अहिंसा का विकास करने का प्रयास करना चाहिए।आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त मुनि कमलकुमारजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी।

 

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