संवर व निर्जरा है धर्म : अध्यात्मवेत्ता आचार्यश्री महाश्रमण
धर्म ही त्राण-शरण’ विषय को आचार्यश्री ने किया व्याख्यायित

-साध्वी दिव्यप्रभाजी व साध्वी संघप्रभाजी ने व्यक्त किए हृदयोद्गार
-संयम पर्याय के पचास वर्ष की सम्पन्नता पर साध्वीद्वय को शांतिदूत ने दिया मंगल आशीष
24.05.2026, रविवार, लाडनूं :जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने रविवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘धर्म ही त्राण-शरण’ पर पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि शास्त्र में धर्म को ही त्राण और शरण बताया गया है। बहुत ही अच्छी बात है और बहुत ऊंची बात है। जहां तक मृत्यु से बचाने वाली है तो इस संदर्भ में यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि इस जीवन से तो एकबार तीर्थंकर भगवान भी जाना होता है तो वर्तमान का साधारण मनुष्यों का क्या है? हां, इस जन्म के बाद किसी को मुक्ति मिल जाए, मोक्ष मिल जाए, वह अलग बात है, किन्तु वर्तमान जीवन का एक बार अवसान तो होना ही होना है। प्रश्न हो सकता है कि धर्म त्राण और शरण है तो किस चीज से त्राण-शरण है। कहा जा सकता है कि पाप से त्राण देने वाला धर्म है, पाप से बचने के लिए शरण देने वाला धर्म है। धर्म की शरण में आ जाने से पाप से बचाव हो सकता है।

संवर कर लो, फिर पापों से बचाव हो सकता है। आश्रवों का निरोध करना संवर होता है। संवर हो गया तो फिर पापों से बचाव कितना संभव हो जाता है। अब आश्रव में ताकत नहीं है कि वह आपके कर्मों का बंधन करा सके। इस रूप में पापों से त्राण और शरण देने वाला धर्म होता है। निर्जरा धर्म की शरण में आ जाने से पूर्वकृत कर्मों का भी निर्जरण हो सकता है। धर्म कितना बड़ा त्राण और शरण है। अन्दर में रहने वाले पापों को भी निर्जीण करने वाला धर्म होता है। यह संवर और निर्जरा धर्म हैं। मिथ्यात्वी भी इस धर्म आ जाए तो उसकी भी रक्षा हो सकेगी।
साधु के लिए तो व्रत संवर और सम्यक्त्व संवर कितना बड़ा सुरक्षा चक्र है। यह कितना बड़ा धर्म है। आदमी को अपनी कषाय मंदता की साधना करने का प्रयास करना चाहिए। वहीं सत्य है अथवा वह सत्य ही है, जिसे जिनों ने प्रवेदित किया है। आदमी को अपने कषायों को पतला करने का प्रयास करना चाहिए। क्रोध, मान, माया और लोभ रूपी कषायों को पतला करने का प्रयास करना चाहिए। इससे चारित्र की निर्मलता भी रह सकती है। आदमी को तत्त्वों को समझने का प्रयास करना चाहिए। अनाग्रह की चेतना हो तो आदमी और अच्छे रूप में ज्ञान का ग्रहण कर सकता है। निश्चय की भूमिका में एक धर्म ही त्राण और शरण देने वाला होता है, दूसरा कोई नहीं।
आचार्यश्री ने प्रवचन के दौरान साध्वी कनकश्रीजी ‘लाडनूं’ ने अपनी अभिव्यक्ति दी। साध्वी दिव्यप्रभाजी व साध्वी संघप्रभाजी के दीक्षा पर्याय के पचास वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आचार्यश्री ने साध्वीद्वय को मंगल आशीष प्रदान करते हुए कहा कि दोनों साध्वियों के लिए अर्ध शताब्दी का समय है। दोनों साध्वियां अपनी सम्यक्त्व की साधना बनी रहे। साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने साध्वीद्वय को उद्बोधित किया। साध्वी दिव्यप्रभाजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। साध्वी संघप्रभाजी ने इस अवसर पर अपने हृदयोद्गार व्यक्त किए।
*




