टॉप न्यूज़दिल्ली NCRसूरत सिटी

वैश्विक संकट: युद्ध के असर से भारत की फार्मास्यूटिकल सप्लाई चेन पर दबाव

तेल और गैस के बाद अब दवाओं पर संकट के संकेत, कच्चे माल के दाम 100% तक बढ़े

नई दिल्लीअमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध ने वैश्विक सप्लाई चेन पर गंभीर असर डालना शुरू कर दिया है। प्रमुख समुद्री मार्गों पर बढ़ती सुरक्षा चिंताओं और अवरोधों के कारण पहले ही क्रूड ऑयल और गैस की कीमतों में तेज उछाल देखा जा रहा है। अब इसका असर भारत के फार्मास्यूटिकल उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक युद्ध और वैश्विक तनाव के चलते भारत की फार्मास्यूटिकल सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ गया है। दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है, जिससे दवा उद्योग के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है।
फार्मास्यूटिकल उद्योग से जुड़े अधिकारियों के हवाले से आई एक रिपोर्ट में बताया गया है कि की स्टार्टिंग मटेरियल (KSM) और एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। ये दोनों दवाओं के निर्माण के लिए सबसे महत्वपूर्ण घटक माने जाते हैं। पिछले सप्ताह वैश्विक तनाव, डॉलर की मजबूती और सप्लाई चेन में बाधाओं के कारण इनकी कीमतों में 10 से 100 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है।
उद्योग विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि युद्ध की स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो इन जरूरी कच्चे माल की कमी भी पैदा हो सकती है। अल्ट्रा ड्रग्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी संदीप अरोड़ा ने कहा कि कच्चे माल की अनिश्चित उपलब्धता के कारण कई व्यापारी नए ऑर्डर लेने से बच रहे हैं, जिससे दवाओं की संभावित कमी की स्थिति बन सकती है।
उन्होंने बताया कि दवा उद्योग में इस्तेमाल होने वाले सॉल्वेंट्स की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। कई मामलों में पिछले कुछ दिनों में सॉल्वेंट्स की कीमतें 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। इसके अलावा कुछ छोटे व्यापारी और सप्लायर्स भी युद्ध की स्थिति का फायदा उठाकर कीमतें बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत अपने API, इंटरमीडिएट्स और अन्य जरूरी फार्मास्यूटिकल कच्चे माल का लगभग 65 से 70 प्रतिशत हिस्सा चीन से आयात करता है, इसलिए वैश्विक बाजार में किसी भी तरह की अनिश्चितता का सीधा असर भारतीय दवा उद्योग पर पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस स्थिति का एक बड़ा कारण डॉलर का मजबूत होना भी है। फार्मास्यूटिकल कच्चे माल का अधिकांश अंतरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर में होता है। ऐसे में डॉलर मजबूत होने से आयात लागत स्वतः बढ़ जाती है।
इसके अलावा लॉजिस्टिक्स से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ती जा रही हैं। मुंबई की एक फार्मास्यूटिकल कंपनी से जुड़े एक उद्योग अधिकारी के अनुसार, बढ़ती सुरक्षा चिंताओं और समुद्री मार्गों पर अवरोधों के कारण कई जहाज और कंटेनर रास्ते में ही फंस रहे हैं या देरी से पहुंच रहे हैं। कई जहाज समय पर बंदरगाहों पर वापस नहीं लौट रहे, जिससे कंटेनरों की भी कमी पैदा हो रही है।
उद्योग जगत का मानना है कि यदि वैश्विक तनाव और युद्ध की स्थिति लंबी चली, तो आने वाले समय में दवाओं की कीमतों और उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button