‘धर्म क्रिया में नहीं, आत्मा में है’ : आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा.
आत्मा में स्थित होने से ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है, धार्मिक क्रियाएं केवल साधन हैं : आचार्यश्री

सूरत। बलेश्वर स्थित आत्म भवन में आयोजित धर्मसभा में आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म उत्कृष्ट मंगल है और सच्चा धर्म बाहरी क्रियाओं में नहीं, बल्कि आत्मा में स्थित होने में है। उन्होंने कहा कि धार्मिक क्रियाएं व्यक्ति को पुण्य और स्वर्ग की प्राप्ति करा सकती हैं, लेकिन मोक्ष तभी संभव है जब धर्म जीवन में उतरकर आत्मानुभूति का रूप ले ले। उन्होंने कहा कि जिसका हृदय धर्म में रचा-बसा होता है, ऐसे धर्मात्मा को देवता भी प्रणाम करते हैं।
आचार्यश्री ने समाधि तंत्र के प्रथम सूत्र की व्याख्या करते हुए कहा कि पूज्यपाद सिद्ध भगवान को इसलिए नमस्कार करते हैं क्योंकि उन्होंने पुरुषार्थ के बल पर सिद्धत्व प्राप्त किया। उन्होंने समझाया कि जैसे मां अपने छोटे बच्चे को चलना सिखाती है, वैसे ही साधक भी निरंतर पुरुषार्थ करते हुए यदि कुछ समय के लिए पूर्ण रूप से आत्मा में स्थित हो जाए, तो क्षायिक सम्यक्त्व की प्राप्ति का मार्ग खुल सकता है। संत कबीर का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सांसारिक कार्य करते हुए भी आत्मस्मरण बनाए रखा जा सकता है। जैसे परीक्षा के समय विद्यार्थी का पूरा ध्यान केवल प्रश्नपत्र पर रहता है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को कार्य करते हुए भी आत्मा और शरीर को भिन्न मानकर आत्माभिमुख रहने का अभ्यास करना चाहिए।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने कहा कि सत्य को असत्य और असत्य को सत्य मानना ही मिथ्यात्व है। जिस प्रकार यात्री वाहन चालक पर विश्वास कर अपने गंतव्य तक पहुंचता है, उसी प्रकार साधक को अपनी आत्मा पर अटूट श्रद्धा रखनी चाहिए।
धर्मसभा में मुंबई, दिल्ली, लुधियाना, चंडीगढ़, इंदौर, करनाल और नासिक सहित विभिन्न शहरों से आए श्रद्धालुओं एवं कंगारू इंडस्ट्रीज के उद्योगपति श्री विश्वाजी सहित अनेक विशिष्टजनों का शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउंडेशन द्वारा सम्मान किया गया। पर्वत पाटिया की तपस्वी रेखाबेन ने अठाई तपस्या पूर्ण कर सात की तपस्या का प्रत्याख्यान ग्रहण किया तथा ऑनलाइन माध्यम से भी अनेक श्रद्धालुओं ने उपवास, एकासन और आयंबिल सहित विभिन्न तपस्याओं के पचक्खान ग्रहण किए। अंत में श्री शाश्वत मुनि जी म.सा. ने “आराधना हो ऐसी, नहीं जन्म लें दुबारा” भजन प्रस्तुत कर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।




