अतीत के संघर्ष और इतिहास को जानकर करें उज्ज्वल भविष्य का निर्माण : आचार्य विमलसागरसूरि

हैदराबाद।
आचार्य विमलसागरसूरीश्वर महाराज ने कहा कि जो समाज अपने भूतकाल के संघर्ष और इतिहास को नहीं जानता, वह समाज अपने उज्ज्वल भविष्य का निर्माण नहीं कर सकता। आपके पास खेल, सिनेमा, राजनीति और विज्ञान के विकास की कितनी ही जानकारियां हों, आपकी संस्कृति और परंपरा को बचाने के लिये वे काम नहीं आ सकती। दूसरों का पता करने से पहले खुद के अस्तित्व के बारे में पता होना चाहिये। एक हजार वर्ष की अपने देश की गुलामी के दौर में अपने गौरवशाली इतिहास को मिटाने के हजारों प्रयास हुए हैं। आजादी के बाद की शैक्षणिक नीति-रीति में भी इतिहास को बदलने अथवा उसे तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत करने के योजनाबद्ध प्रयत्न हुए हैं। हम सबको गलत इतिहास पढ़ाया गया है। हमारी नई पीढियां वास्तविकताओं से लगभग अनभिज्ञ हैं।
महावीरस्वामी जैन श्वेतांबर संघ, फीलखाना के तत्वावधान में रविवार को आयोजित दूसरे जागरण सेमिनार में जैनाचार्य ने डेढ़ हजार वर्ष के संघर्षमय इतिहास से अपने वक्तव्य की शुरुआत की। कल्याणकारी तपागच्छ वर्षावास समिति द्वारा एग्जिबिशन ग्राउंड स्थित जगद् गुरु हीरसूरि वाटिका में आयोजित इस सेमिनार में दो हजार से अधिक युवक-युवतियों उपस्थित थे। आचार्य विमलसागरसूरीश्वर महाराज ने बताया कि दक्षिण भारत के केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और गोवा में कभी जैन राजाओं का गौरवशाली शासन था। चालुक्य, चौल, पल्लव, गंग, कदंब, राष्ट्रकूट, होइशाला और विजयनगर साम्राज्य ने यहां सैकड़ों वर्षों तक सफल शासन व्यवस्था देकर प्रजा के हित का काम किया था। उनके काल में न्याय-नीति पूर्वक मानवता और सभी धर्म परंपराओं का सुंदर संरक्षण हुआ था। वक्त और मान्यताओं के बदलते ही धीरे-धीरे सब-कुछ समाप्त हो गया। बावजूद इसके तमिल व कन्नड़ भाषा तथा उनके प्राचीन साहित्य पर जैनाचार्यों और जैन कवियों के उपकारों को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
जैनाचार्य ने आगे कहा कि तमिल व कन्नड़ भाषा में उपलब्ध प्राचीन अधिकांश साहित्यिक कृतियां विद्वान जैन आचार्यों और कवियों के अद्वितीय योगदान की याद दिलाती हैं। द्रविड़ नेता करुणानिधि ने कभी चेन्नई में एक समारोह में कहा था कि जैनाचार्यों ने तमिल साहित्य की बहुत सेवा की है। उनकी बदौलत हमारे पास ऐतिहासिक साहित्य उपलब्ध है। मैसूर के अंतिम महाराजा ने कहा था कि पंपा, रन्ना, जन्ना और पोन्ना, कन्नड़ भाषा के प्रसिद्ध चारों प्राचीन कवि जैन थे। कन्नड़ भाषा की उपलब्ध प्राचीन कृतियां इन्हीं की अमर रचनाएं हैं। कर्नाटक सरकार प्रतिवर्ष पंपा कवि के नाम से तो साहित्यिक पुरस्कार भी प्रदान करती है। इन साम्राज्यों के शासन काल में द्रविड़ शिल्पकला के विकास और अनेक ऐतिहासिक जैन मंदिरों के निर्माण के कार्य हुए। महाबलीपुरम, तंजावुर, तिरुपति, विल्लीपुरम, कुंभकोणम, टिंडीवनम, मदुरै, बेलूर, हंपी, श्रवण बेलगोला आदि के अनेक ऐतिहासिक मंदिर इस बात के जीवंत उदाहरण हैं। इन साम्राज्यों ने आपसी विवादों से बचते हुए सद्भावना पूर्वक सदियों तक शत्रुओं को दक्षिण में घुसने नहीं दिया।
मुकेशकुमार चौहान ने बताया कि जैनाचार्य के महामंगलपाठ के बाद लाभार्थियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। अतिथि के रूप में उपस्थित जैन समाज के सफल उद्यमी और अनेक संस्थाओं में कार्यरत गौतमकुमार सहलोत और विमलचंद नाहर का संघ व समिति के अध्यक्ष मोहनलाल बागरेचा ने तिलक, माल्यार्पण, शॉल एवं स्मृतिचिन्ह प्रदान कर सम्मान किया।
दोपहर को महावीर भवन में गणिवर्य पद्मविमलसागर महाराज के सान्निध्य में दूसरे बाल संस्कार शिविर का आयोजन हुआ। अनेक धार्मिक, चारित्रिक और नैतिक विषयों के प्रशिक्षण के साथ-साथ रोचक प्रतियोगिताएं आयोजित की गई। बालक-बालिकाओं ने उत्साह पूर्वक इसमें भाग लिया। सोमवार से पुनः एग्जिबिशन ग्राउंड में प्रातः सवा नौ बजे धर्मसभा का आयोजन होगा।



