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सद्ज्ञान और चारित्र से दीप्तिमान बने साधु : सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण

-युगप्रधान आचार्यश्री ने आज के निर्धारित विषय को किया व्याख्यायित-आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को भी किया उत्तरित

04.07.2026, शनिवार, लाडनूं :जन-जन को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान करने वाले अखण्ड परिव्राजक, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शनिवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘सूर्य की तरह दीप्तिमान रहें’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि इस सृष्टि में सूर्य भी है, चन्द्रमा भी है, पृथ्वी भी है, प्राणी भी हैं, जीव भी हैं और सिद्ध भगवान भी हैं। सूर्य एक तेजस्वी तत्त्व है। सूर्य कितना मर्यादित रूप में उदित होता है और उतने ही मर्यादित रूप में अस्ताचल की ओर चला जाता है। एकदम निर्धारित समय पर उदय होना और निर्धारित समय पर ही अस्त हो जाने वाले सूर्य से समयनिष्ठा की प्रेरणा ली जा सकती है। समय नियमितता सूर्य से सीखी जा सकती है।

पहले से ही निर्धारित होता है कि सूर्योदय इतने बजे ही होगा। कोई व्यक्ति, ट्रेन आदि कभी विलम्ब हो जाए, कोई अपना कार्य समय पर पूरा करे अथवा न करे, किन्तु सूर्य की नियमितता, समयनिष्ठा कभी टल नहीं सकती। सूर्य में प्रकाशवत्ता भी है। अंधकार है वहां, जहां आदित्य नहीं है। मुर्दा है वह देश जहां साहित्य नहीं है। सूर्य प्रकाश देने वाला है। सूर्य से सभी को कितना सहयोग मिलता है। प्रकाश होता है तो पढ़ाई हो सकती है, ईर्या समिति का विशेष ध्यान रखा जा सकता है। सूर्य स्वयं प्रकाशवान है और दूसरों को भी ज्योति प्रदान करने वाला है।

सूर्य में ताप भी होता है। ठंड के महीने में जब सूर्य उगता है तो ठंड को भगाने वाला होता है। सूर्य में तापवत्ता है, यह भी उसका एक गुण है। सृष्टि का सूर्य मानों कितनी नियमितता से अपना कार्य करता है। आगम में कहा गया है कि जिस प्रकार आकाश में सूर्य चमकता है, उसी प्रकार महर्षि को भी दीप्तिमान होना चाहिए। जो सद्ज्ञान से सम्पन्न होता है, जिनके पास ज्ञान का भण्डार हो, वह साधु प्रकाशवान हो सकता है। ज्ञान भी प्रकाश प्रदान करने वाला होता है। साधु को मति ज्ञान और श्रुत ज्ञान सम्पन्न होना चाहिए। यह दो ज्ञान सामान्य मनुष्य और पशु में भी हो सकते हैं।

कोई साधु-संत अध्यात्म विद्या का सद्ज्ञान देने वाले मिल जाएं तो कितना अच्छा हो सकता है। स्वयं के साथ-साथ सहवर्ती छोटे साधु-साध्वियों के विकास का भी प्रयास होना चाहिए। आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों को विशेष प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि साझ के अग्रणी साधु-साध्वियां तीन साल में कम से कम एक वैरागी-वैरागण बनाकर प्रस्तुत करने का प्रयास हो तो यह भी कितनी बड़ी सेवा हो सकती है। इस प्रकार साधु में भी सद्ज्ञान का प्रकाश हो तो विशेष बात हो सकती है। सूर्य से नियमितता, प्रकाशवत्ता और तापवत्ता रूपी गुण की प्रेरणा ली जा सकती है। साधु के ज्ञान और चारित्र दोनों तेजस्वी बनें, दोनों का अच्छा विकास हो।

मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए।

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