मन रूपी अश्व पर हो श्रुत की लगाम : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण -‘
मन रूपी अश्व पर हो श्रुत की लगाम : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

‘उत्तम जाति का घोड़ा’ विषय को आचार्यश्री ने किया विवेचित ज्ञानवान, आचारवान, सेवाभावी व विनयशील बनने हेतु आचार्यश्री ने किया अभिप्रेरित
चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को आचार्यश्री ने किया उत्तरित 16.07.2026, गुरुवार, लाडनूं
:जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में आज के निर्धारित विषय ‘उत्तम जाति का घोड़ा’ को आगम के माध्यम से विवेचित करते हुए कहा कि आदमी को बिना सोचे, सहसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए। यह अविवेक होता है, जो परम विपत्तियों का जनक भी कहलाता है। आदमी को कोई भी कार्य विवेकपूर्ण ढंग से करने का प्रयास करना चाहिए। क्या उचित, क्या अनुचित, क्या हित और क्या अनहित, क्या कर्त्तव्य और क्या अकर्त्तव्य- इन सबका विवेचन करने के बाद ही आदमी को कोई कार्य करने का प्रयास करना चाहिए।
पुण्यों से यश मिलता है। कोई आदमी बहुत मेहनत करता है, किन्तु उसे उतनी यश की प्राप्ति नहीं होती और कोई थोड़ा ही कार्य करता है, लेकिन उसे खूब यश की प्राप्ति हो जाती है। यह उसकी पुण्यवत्ता का प्रभाव होता है। पुण्यों का अपना क्रम है। पूर्वकृत पुण्य रक्षा करते हैं, यश प्रदान करते हैं। पुण्य से पद-प्रतिष्ठा भी प्राप्त हो जाए। पुण्य से और अन्य अनुकूलताएं मिल सकती हैं। इस प्रकार आदमी के जीवन में पुण्य का भी अपना प्रताप होता है।
कोई छोटा बालक साधु बन जाता है। वह कुछ पूर्व का पुण्य कर्म साथ लेकर आया था तो उसे साधुत्व की प्राप्ति हो गई, किन्तु अब वह साधना नहीं, प्रमाद करता है। बातें, हंसी-मजाक, साधुत्व के प्रति कोई आस्था नहीं, विकथा में मस्त रहता है। प्रमाद से पुण्य का क्षय हो जाता है। इसलिए साधु को प्रमाद से बचने का प्रयास करना चाहिए। साधु को हमेशा संयम के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। जागरूक साधु होता है और जप, तप, धर्म-ध्यान में रहता है तो पुण्य के अर्जन से अनुकूलता, नाम-ख्याति आदि की प्राप्ति भी हो सकती है। पुण्य अच्छे रूप में उदय आ जाए तो कितनी अच्छी बात हो सकती है। 
साधु अपने साधुचर्या आदि की अनुपालना करे तो उसका पुण्य नष्ट भी हो सकता है, क्षय भी हो सकता है। साधु को मोक्ष प्राप्ति के लिए संयम और निर्जरा पर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। पुण्य का अर्जन भी थोड़ा होता है तो शरीर की अनुकूलता बनी रह सकती है। साधु को परिश्रमशील होना चाहिए। कुछ अधिक किलोमीटर का विहार करना हो तो भी कोई बात नहीं। व्याख्यान देना हो, सेवा करनी हो, व्याख्यान आदि देना हो घंटे-दो घंटे व्याख्यान भी दे सके। ऐसी अनुकूलता बनी रहे, इसका प्रयास होना चाहिए। जीवन में अच्छा कार्य करने का प्रयास करना चाहिए। अनुकूलता होती है तो साधना में सहयोग प्राप्त हो जाता है। हालांकि सामान्य आदमी हो या साधु, उसे तो अपनी कर्म निर्जरा और कभी मोक्ष की प्राप्ति हो, उस पर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। 
मन रूपी घोड़ा दौड़ रहा है, बड़ा भयंकर और साहसिक है जो बिना सोचे दौड़ लगाने वाला है। इस पर प्रत्येक जीव चढ़ा हुआ है, वह उसे उन्मार्ग पर ले जा सकता है। जो मनुष्य अपने मन रूपी दुष्ट अश्व पर श्रुत (ज्ञान) रूपी रस्सी से नियंत्रण में रखता है, वह दुष्ट मन उन्मार्ग में नहीं जा सकता। ज्ञान का मन पर लगाम हो तो मन रूपी दुष्ट अश्व को उत्तम जाति का अश्व बनाया जा सकता है। इसलिए आदमी को अपने ज्ञान का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। साधु को भी ज्ञान का खूब अर्जन करने का प्रयास होना चाहिए। साधु ज्ञानवान हो, आचारवान हो, सेवाभावी हो, विनयशील हो, ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करने का प्रयास होना चाहिए। अपनी आध्यात्मिक चेतना के जागरण का प्रयास हो। साध्वी संघप्रभाजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।




