लोकमाता सूर्यपुत्री तापी मैया की जयंती आज, श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाएगा तापी अवतरण दिवस
ऐतिहासिक, पौराणिक और भौगोलिक महत्व से समृद्ध तापी नदी दक्षिण गुजरात की जीवनरेखा, दुनिया में अपनी तरह का अनूठा उत्सव

सूरत। हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष आषाढ़ शुक्ल सप्तमी को तापी अवतरण दिवस (तापी जयंती) श्रद्धा, आस्था और उत्साह के साथ मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार सूर्यदेव की आंखों से गिरे अश्रु से सूर्यपुत्री लोकमाता तापी मैया का प्राकट्य हुआ था। यही कारण है कि सूरत और तापी तटवर्ती क्षेत्रों में इस दिन विशेष पूजा-अर्चना, चुनरी अर्पण और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। माना जाता है कि विश्व में तापी नदी ही एकमात्र ऐसी नदी है, जिसका प्राकट्य दिवस विशेष रूप से मनाया जाता है।
शास्त्रों में तापी नदी का अत्यंत महत्त्व बताया गया है। मान्यता है कि गंगा में स्नान, यमुना का आचमन, नर्मदा के दर्शन और सूर्यपुत्री तापी का केवल स्मरण करने मात्र से भी पुण्य की प्राप्ति होती है। ‘तापी’ शब्द का उद्भव सूर्यपुत्री ‘ताप्ती’ से माना जाता है तथा तापी पुराण में इसके महात्म्य और तट पर स्थित अनेक पौराणिक तीर्थों का विस्तृत वर्णन मिलता है। 
इतिहास के अनुसार वर्ष 1604 में गोकर्ण ने संस्कृत में तापी पुराण की रचना की थी, जिसके आधार पर वर्ष 1932 में चिमनलाल पंड्या ने तापी माहात्म्य की रचना की। मुगलकाल में सूरत का बंदरगाह व्यापार और हज यात्रा का प्रमुख केंद्र था। उस समय डक्का ओवारा (पूर्व में मक्का ओवारा) से हज यात्रियों के जहाज तापी नदी के रास्ते अरब सागर में प्रवेश करते थे।
तापी नदी का उद्गम मध्यप्रदेश के बैतूल जिले की सतपुड़ा पर्वतमाला स्थित मुलताई (बैतूल सरोवर) से होता है। इसकी कुल लंबाई लगभग 752 किलोमीटर है, जिसमें से 224 किलोमीटर गुजरात में बहती है। यह महाराष्ट्र से होकर गुजरात के तापी जिले के निजर क्षेत्र में प्रवेश करती है और अंततः खंभात की खाड़ी के माध्यम से अरब सागर में मिलती है। गुजरात में उकाई बांध और काकरापार बांध तथा महाराष्ट्र में हथनूर बांध और प्रकाशा बैराज इसी नदी पर स्थित हैं।
एक रोचक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि दक्षिण थाईलैंड की सबसे बड़ी नदी का नाम भी ‘तापी’ है। बताया जाता है कि वर्ष 1915 में भारत आए एक बौद्ध यात्री सूर्यपुत्री तापी से प्रभावित होकर यहां का जल थाईलैंड ले गए और वहां की नदी में अर्पित किया। इसके बाद उस नदी का नाम तापी तथा उसके किनारे बसे नगर का नाम सूरत थानी रखा गया। 
दक्षिण गुजरात की जीवनरेखा कही जाने वाली तापी नदी अनेक सहायक नदियों से समृद्ध है और इसके किनारे सूरत, कामरेज, निजर, उच्छल, सोंगढ़ तथा मंडवी जैसे प्रमुख नगर बसे हुए हैं। तापी जयंती पर जहांगीरपुरा के कुरुक्षेत्र तथा डक्का ओवारा सहित विभिन्न घाटों पर श्रद्धालु विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और लगभग 1100 मीटर लंबी चुनरी तापी मैया को अर्पित कर सुख, समृद्धि और कल्याण की कामना करते हैं।
तापी नदी केवल जलधारा ही नहीं, बल्कि दक्षिण गुजरात की संस्कृति, आस्था, इतिहास और जनजीवन की धड़कन मानी जाती है, जिसके प्रति सुरतवासियों की श्रद्धा पीढ़ियों से अटूट बनी हुई है।




