आचार्य महाप्रज्ञ का जीवन मानवता के लिए प्रकाश स्तंभ, उनके आदर्शों से हर घर बन सकता है स्वर्ग : मुनि डॉ. मदन कुमार

सूरत जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के दसवें आचार्य एवं युगप्रधान आचार्य महाप्रज्ञ के 107वें जन्मोत्सव ‘प्रज्ञा दिवस’ के अवसर पर सिटीलाइट स्थित सूर्या कॉम्प्लेक्स में विशेष आध्यात्मिक प्रवचन का आयोजन किया गया। इस अवसर पर उनके सुशिष्य मुनि डॉ. मदन कुमार ने आचार्य महाप्रज्ञ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका संपूर्ण जीवन मानवता के लिए एक प्रकाश स्तंभ है और उनके आदर्शों को अपनाकर प्रत्येक घर को स्वर्ग बनाया जा सकता है।
मुनि श्री ने कहा कि आचार्य महाप्रज्ञ विरल व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने देशभर में अहिंसा यात्रा के माध्यम से शांति, सद्भाव और नैतिक जीवन का संदेश दिया। कच्छ से कोलकाता तथा कश्मीर से कन्याकुमारी तक उन्होंने व्यापक जनजागरण किया। वे प्रखर वक्ता, महान दार्शनिक और सिद्धहस्त लेखक थे। उन्होंने 300 से अधिक ग्रंथों की रचना कर आध्यात्मिक एवं मानवीय मूल्यों को नई दिशा दी। उन्होंने आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ के आत्मीय संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वयं आचार्य तुलसी ने कहा था, “तुलसी में महाप्रज्ञ को देखो और महाप्रज्ञ में तुलसी को देखो।”

वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए मुनि श्री ने कहा कि जिस परिवार में बड़े-बुजुर्गों का सम्मान होता है, वह घर स्वर्ग बन जाता है। नैतिकता, संयम और सदाचार ही सुखी परिवार एवं स्वस्थ समाज की आधारशिला हैं। उन्होंने कहा कि साधु धर्म का मूर्त स्वरूप होता है और प्रत्येक श्रावक का लक्ष्य श्रेष्ठ चरित्र एवं आदर्श जीवन होना चाहिए।
उन्होंने बताया कि आचार्य महाप्रज्ञ ने अपना संपूर्ण जीवन स्वाध्याय, आत्म-साधना और परोपकार को समर्पित किया। प्रेक्षाध्यान के माध्यम से उन्होंने तनाव और अवसाद से मुक्ति का प्रभावी मार्ग बताया। मुनि श्री ने कहा कि आचार्य महाप्रज्ञ का शांत व्यक्तित्व, सदैव प्रसन्न रहने की प्रवृत्ति, अमृतमयी वाणी और करुणामय जीवन आज भी मानवता के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उन्होंने मात्र साढ़े दस वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण की और गुरु आचार्य तुलसी के सान्निध्य में रहकर विशिष्ट ज्ञान अर्जित किया।
इस अवसर पर मुनि संयम कुमार ने मंगल भावना व्यक्त की, जबकि मुनि कल्प कुमार ने अवदमन, शमन एवं उन्नयन को मोक्ष की स्वर्णिम सीढ़ियां बताते हुए जागरूक और अप्रमादी जीवन जीने का संदेश दिया। अणुव्रत विश्व भारती के परीक्षा प्रकल्प के राष्ट्रीय प्रभारी अर्जुन मेड़तवाल ने वर्ष 2003 में सूरत में हुए आचार्य महाप्रज्ञ के ऐतिहासिक चातुर्मास का स्मरण करते हुए स्वरचित मुक्तकों के माध्यम से भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्य महाप्रज्ञ के सिद्धांतों पर चलने, संयम, नैतिकता और प्रसन्नता को जीवन में अपनाने का सामूहिक संकल्प लिया




