साधु में धीरता होनी आवश्यक : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
धीर पुरुष का सामर्थ्य’ को आचार्यश्री ने किया विवेचित

–सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों को मिला आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद
-शिविरार्थियों की जिज्ञासाओं को युगप्रधान आचार्यश्री ने किया उत्तरित
-कोलकाता ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने दी अपनी प्रस्तुतियां
*22.05.2026, शुक्रवार, लाडनूं :* भारत भर में इस समय भीषण गर्मी पड़ रही है। सरकार ने कई राज्यों में लू से बचने की चेतावनी जारी कर रखी है। ऐसे में राजस्थान का तापमान और अधिक है। गर्मी को देखते हुए जहां देश भर के स्कूलों में छुट्टियां हो गई हैं तो वहीं दूसरी ओर जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में तेरापंथ धर्मसंघ के बालक और बालिकाएं सैंकड़ों की संख्या में पहुंचकर धार्मिक-आध्यात्मिक सत्संस्कारों को ग्रहण करने में लगे हुए हैं। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में शुक्रवार से सघन साधना शिविर का शुभारम्भ हुआ, जिसमें देश भर से करीब 300 बालक-बालिकाएं संभागी बन रहे हैं। आज मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान शिविरार्थियों को आचार्यश्री ने पावन प्रेरणा प्रदान करने के साथ-साथ अपनी जिज्ञासाओं को भी प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया।

शुक्रवार को मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘धीर पुरुष का सामर्थ्य’ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साधुत्व का ग्रहण होना अनंतकाल की जीव यात्रा में बहुत बड़ा कदम उठाना होता है। वह कदम कौन अच्छे रूप में उठाता है? इस संदर्भ में शास्त्र में बताया गया है कि जो मनुष्य लिए हुए भार को उठाने में समर्थ होते हैं, तपस्या से उदार होते हैं, तपःप्रधान होते हैं और धीर होते हैं, वे ही साधुत्व को स्वीकार कर सकते हैं। साधुपन ले लेने के बाद भी यदि अधीरता आती रहती है तो कठिनाई की स्थिति बन सकती है। अधीर आदमी कब आवेश में आए और साधुचर्या को छोड़ दे।

जो धीर पुरुष होते हैं, वे भिक्षाचर्या का आचरण करते हैं। जगह-जगह घरों में जाकर आहार प्रदान करना भिक्षाचर्या कहलाती है, लेकिन एक दृष्टि से साधु का पूरा जीवन ही भिक्षाचर्या हो जाती है। साधु के लिए धीर होना अपेक्षित होता है। जिसमें धृति नहीं हो, वह श्रामण्य का पालन कैसे कर सकता है। पग-पग पर अधीर होने वाले का क्या भरोसा। साधु में धीरता होनी चाहिए। कभी कोई बिना गलती भी उलाहना सुनना पड़ भी जाए तो धीरता रखने का प्रयास करना चाहिए। अधीरता के आश्रय से बचने का प्रयास करना चाहिए। साधु को तो समता भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। जो धीर होते हैं काम-भोगों का त्याग कर त्याग के पथ पर आगे बढ़ जाते हैं। साधुत्व का जीवन तो बहुत ऊंची साधना के लिए है। चारित्रात्माओं के लिए पठन-पाठन का कार्य करना भी एक सेवा है। धूप में भी पैदल चलना कितनी बड़ी तपस्या होती है।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में सघन साधना शिविर के शिविरार्थी आचार्यश्री के समक्ष उपस्थित थे। आचार्यश्री ने शिविरार्थियों को मंगल आशीष प्रदान करते हुए कहा कि इस शिविर में ज्ञानाराधना के साथ-साथ संयम की साधना भी चले, ऐसा प्रयास करना चाहिए। कक्षाओं में अच्छा ज्ञान ग्रहण करने का प्रयास हो। टीवी, मोबाइल से दूरी हो, अभी यह धर्म रूपी स्कूल है। इस स्कूल में जितना संभव हो गहराई से ज्ञानार्जन का प्रयास हो। तदुपरान्त शिविरार्थियों ने पूज्यप्रवर के समक्ष अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत किया तो आचार्यश्री ने उनकी जिज्ञासाओं को उत्तरित किया। गुरु सन्निधि में पहुंचे कोलकाता ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी अनेक प्रस्तुतियां दीं।




