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जीआई टैग प्राप्त जरी उद्योग के 120 वर्ष पुराने ऐतिहासिक मूल

सूरत के जरी उद्योग की सुनहरी चमक, सालाना 800–900 करोड़ का कारोबार मुगल काल से देश-विदेश में प्रसिद्ध ‘जरी उद्योग’ की विरासत आज भी जीवित

सूरतदक्षिण गुजरात में एमएसएमई, औद्योगिक और क्षेत्रीय विकास को गति देने के लिए 1 और 2 मई को ‘वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस’ का तीसरा संस्करण सूरत में आयोजित होगा। इस सम्मेलन की मेजबानी करने वाला राज्य का आर्थिक केंद्र सूरत शहर अपनी व्यावसायिक समझ और उद्यमशीलता के कारण देश-विदेश में प्रसिद्ध है। हीरा और कपड़ा उद्योग के लिए विश्वविख्यात सूरत का ‘जरी उद्योग’ इस शहर की साहसिकता और प्राचीन गौरव को उजागर करता है।
सूरत शहर के बेगमपुरा, वाडीफलिया, खटोदरा, भाठेना और नवापुरा जैसे क्षेत्र एक सदी पहले विकसित हुए जरी उद्योग के प्रमुख केंद्र रहे हैं। मूल रूप से सूरत के गोला-कणबी, खत्री, राणा और पटेल समाज के परिवार लगभग 120 वर्षों से इस पारंपरिक कला को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखे हुए हैं। सूरत की भौगोलिक स्थिति और यहां की नमी वाली जलवायु जरी के धागों के बुनाई और खिंचाव के लिए अत्यंत अनुकूल है, जिसके कारण यहां तैयार होने वाली जरी की गुणवत्ता सर्वोत्तम मानी जाती है।
वर्तमान समय में सूरत का जरी उद्योग आधुनिकता के साथ कदम मिला रहा है। आज यहां लगभग 80 प्रतिशत उत्पादन सस्ती और टिकाऊ मेटालिक यार्न जरी का होता है, जबकि 20 प्रतिशत असली जरी का उत्पादन अभी भी जारी है।
सूरत के वराछा, कतारगाम और पुना क्षेत्रों में आज भी हजारों घरों में जरी का काम होता है। वर्तमान में सूरत भारत का लगभग 70 प्रतिशत जरी उत्पादन करने वाला प्रमुख शहर है और जरी उद्योग में उपयोग होने वाली मशीनरी का निर्माण भी यहीं होता है।
सूरत जरी मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष बंकीमचंद्र जरीवाला के अनुसार, पहले जरी शुद्ध सोने और चांदी से बनाई जाती थी, लेकिन समय के साथ यह तांबे और कांसे में बनने लगी। असली जरी के बढ़ते दामों के कारण पिछले 10–15 वर्षों में प्लास्टिक धागों से मेटालिक यार्न जरी का उत्पादन भी शुरू हो गया है।
वर्तमान में सूरत में जरी उद्योग के लगभग 800 से अधिक यूनिट पंजीकृत हैं, जिनका सालाना टर्नओवर करीब 800 से 900 करोड़ रुपये है। इस ऐतिहासिक उद्योग से सीधे और परोक्ष रूप से लगभग 2.5 लाख लोग जुड़े हुए हैं और आज भी जरी उनके जीवनयापन का मुख्य साधन है।
जरी का उपयोग मुख्य रूप से महंगी साड़ियों और कढ़ाईदार परिधानों में किया जाता है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में कुशल कारीगरों द्वारा जरी से बनी कांचीवरम, कोचंपल, धर्मवरम, बैंगलोरी और बनारसी सिल्क साड़ियां बेहद प्रसिद्ध हैं।

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