धर्म का संचय करे मानव : मानवता के मसीहा महाश्रमण
जिन्दगी सफल बनाएं हम’ विषय को आचार्यश्री ने किया व्याख्यायित

20.05.2026, बुधवार, लाडनूं ।जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘जिन्दगी सफल बनाएं हम’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि शास्त्र में एक तथ्य प्रस्तुत किया गया है कि समय की सफलता कैसे होती है और समय की अफलता कैसे होती है। समय का स्वभाव है वर्तना अर्थात् समय बीतता है। जो-जो रात्रियां बीत जाती हैं, वे लौटती नहीं हैं। यह एक बहुत बड़ा तथ्य है। अब चाहे कोई पाप करने वाला हो या पुण्य करने वाला अथवा साधना करने वाला, जिसका जितना समय बीत गया है, वह वापस नहीं लौटता। उस समय का पुनरागमन नहीं हो सकता। अब आगे नया समय ही आएगा। इसलिए इस संदर्भ में आदमी को यह चिंतन करना चाहिए कि समय का कैसे और क्या उपयोग करूं।

जो पुनर्जन्मवाद, कर्मवाद, मोक्ष को मानने वाला है, वह व्यक्ति विशेष रूप से अपने वर्तमान जीवन में भी जितना संभव हो सके, धर्म के अनुकूल आचरण करते हुए धर्म का संचय करने का प्रयास करना चाहिए। किसी आदमी को वर्तमान जीवन में बहुत अनुकूलताएं प्राप्त हों तो उसे समझना चाहिए कि उसके पूर्वकृत पुण्याई का फल प्राप्त हो रहा है, इसलिए वर्तमान जीवन में भी उसे धर्म की कमाई करने का प्रयास करना चाहिए। गृहस्थ अपने जीवन में धन का संचय भी करते हैं तो उसे अपने जीवन में धर्म का संचय भी करना चाहिए। धर्म के संचय के लिए कुछ समय नौकारसी, पौरुषी का त्याग हो। नवकार की माला जपे, रोज एक सामायिक का प्रयास हो, इस प्रकार रोज कुछ समय धर्म में लगाने का प्रयास करना चाहिए।

आदमी यह सोचे कि हमारा वर्तमान जीवन ही नहीं, भविष्य भी अच्छा बने। इसके लिए आदमी को धर्म के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। चारित्रात्माएं हैं, वे देखें कि रात को चितारना करते हैं या नहीं। दो सौ, तीन सौ आदि गाथाओं का चितारना हो रहा है या नहीं। रात के समय जप, ध्यान आदि के विषय में भी आत्मचिंतन करने का प्रयास होना चाहिए। प्रतिक्रमण, अर्हत् वंदना कितने अच्छे रूप में हो रहा है। प्रतिदिन आलोयणा भी अच्छे रूप में करने का प्रयास हो। प्रतिदिन आत्मचिंतन करते हुए जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास हो। आदमी को प्रतिदिन को अच्छे ढंग से और धर्म-ध्यान में बीते, अच्छे कार्यों में बीते इसका प्रयास होना चाहिए। इस प्रकार धर्म करने वाले की रात्रि सफल हो जाती है और अधर्म करने वाली रात्रियां अफल हो जाती हैं।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को जिज्ञासा प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया तो अनेक चारित्रात्माओं ने अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत किया, जिसे आचार्यश्री ने उत्तरित किया। आचार्यश्री की अभ्यर्थना के क्रम में मुनि प्रीतकुमारजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी।



