
गैस संकट और मंदी से सूरत का टेक्सटाइल उद्योग बेहाल, 8 लाख से अधिक श्रमिकों का पलायन
वीविंग ,प्रोसेसिंग,एम्ब्रॉयडरी,मार्केट में लेबर की कमी से संकट में कपड़ा उधोग,वीविंग यूनिटों में एक पाली ही चालू, उत्पादन 40% घटा
सूरत। शहर के प्रमुख टेक्सटाइल उद्योग पर इस समय दोहरी मार पड़ रही है—एक ओर रसोई गैस की भारी किल्लत और आसमान छूती कीमतें, तो दूसरी ओर उद्योग में गहराती मंदी। इन हालातों ने श्रमिकों को शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि अब तक 8 लाख से अधिक श्रमिक सूरत से अपने वतन लौट चुके हैं।
हर साल गर्मी की छुट्टियों या शादी-ब्याह के मौसम में श्रमिक घर जाते हैं, लेकिन इस बार हालात अलग हैं। गैस सिलेंडर की कमी और ब्लैक में दोगुने-तीन गुने दाम के बावजूद उपलब्धता न होने से श्रमिकों के सामने रोजमर्रा का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में बिना काम और महंगे जीवनयापन के चलते शहर में टिके रहना मुश्किल हो गया है।
सूरत में करीब 35 हजार लूम्स इकाइयाँ, 350 से अधिक मिलें और 70 हजार से ज्यादा कपड़ा दुकानें संचालित होती हैं, जिन पर लगभग 18 से 20 लाख श्रमिकों की रोजी-रोटी निर्भर है। लेकिन मौजूदा समय में यार्न के बढ़ते दाम और बाजार में कमजोर मांग के कारण करीब 50 प्रतिशत वीविंग यूनिट्स केवल एक पाली (सिंगल शिफ्ट) में चल रही हैं। इतना ही नहीं, इन यूनिट्स में भी आधी मशीनें ही चालू हैं, जिससे कपड़ा उत्पादन में 35 से 40 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है।
उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि कई यूनिट्स सिर्फ नाम मात्र के लिए चालू रखी जा रही हैं, क्योंकि पूरी तरह बंद करना नुकसानदायक साबित हो सकता है। यदि यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो सूरत की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है।
आने वाले समय में कारीगरों की कमी बनेगी बड़ी चुनौती
तेजी के समय सबसे बड़ी चिंता कारीगरों की कमी को लेकर जताई जा रही है। जिस तेजी से परप्रांतीय श्रमिक शहर छोड़ रहे हैं, उससे भविष्य में उत्पादन बढ़ने पर मजदूरों की भारी कमी हो सकती है। उद्योगपतियों का कहना है कि कई श्रमिक ऐसे हैं जो गैस की उपलब्धता होने पर सूरत छोड़कर नहीं जाते। ऐसे में प्रशासन को इस दिशा में त्वरित कदम उठाने की जरूरत है।
प्रोसेसिंग सेक्टर में 25% श्रमिकों की कमी, कामकाज प्रभावित
टेक्सटाइल प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में भी लगभग 25 प्रतिशत श्रमिकों की कमी हो गई है। मांग में कमी के चलते मिलों में उत्पादन कार्यक्रम भी घट गए हैं। हालांकि मिलों को पूरी तरह बंद करना संभव नहीं है। श्रमिकों को रोकने के लिए एसोसिएशन द्वारा भोजनालय चलाकर करीब 7 हजार मजदूरों के खाने की व्यवस्था की गई है, लेकिन इसके बावजूद पलायन नहीं रुक रहा।
कपड़ा बाजार में श्रमिकों की कमी का असर साफ दिखाई दे रहा है। फोल्डिंग, पैकिंग, कटिंग और चेकिंग जैसे काम प्रभावित हो रहे हैं। जहां एक अनुभवी कर्मचारी पहले 1000 मीटर कपड़ा फोल्ड करता था, वहीं अब नया श्रमिक मुश्किल से 250 मीटर ही काम कर पा रहा है। यही स्थिति अन्य कार्यों में भी देखने को मिल रही है।
सूरत के वीविंग, डाइंग-प्रिंटिंग, एम्ब्रॉयडरी और गारमेंट सेक्टर में उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के श्रमिक बड़ी संख्या में काम करते हैं। लेकिन हर साल पलायन के बाद उद्योगपतियों को खर्च करके श्रमिकों को वापस बुलाना पड़ता है। इस बार गैस संकट और मंदी के कारण स्थिति और गंभीर हो गई है।
यदि गैस आपूर्ति और उद्योग की स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो सूरत का टेक्सटाइल उद्योग गहरे संकट में फंस सकता है। साथ ही, आने वाले समय में कारीगरों की कमी से उत्पादन पर भी बड़ा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।



