महंतों, त्यागियों और तपस्वियों के कारण ही भारत में धर्म की जड़ें आज भी मजबूत हैं-जैनाचार्य पद्मदर्शनसूरिजी
सत्संग सप्ताह में भावविभोर हुए श्रद्धालु

सूरत। पीपलोद–डुमस रोड स्थित ऑडी कार शोरूम के पीछे अवस्थित श्री शांतिनाथ श्वे. मू. पू. तपागच्छ जैन संघ में आयोजित ‘सत्संग सप्ताह’ के अंतर्गत चल रही प्रवचनमाला में बड़ी संख्या में श्रद्धालु सत्संग का रसास्वादन कर रहे हैं।
प्रवचनमाला के पाँचवें दिन जैनाचार्य पू. पद्मदर्शनसूरिजी महाराज ने कहा कि आर्यावर्त की संस्कृति मूलतः धर्मप्रधान रही है और उसकी रक्षा केवल धर्मानुष्ठानों के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी भोगवादी प्रवृत्तियों के आक्रामक प्रभाव ने धर्म को हाशिये पर धकेलने का प्रयास किया है, किंतु संतों, महंतों, त्यागियों और तपस्वियों के कारण ही भारत में धर्म की जड़ें आज भी मजबूत हैं।
उन्होंने कहा कि जिन देशों में धर्म का आधार कमजोर हुआ है, वहाँ प्राकृतिक व कृत्रिम आपदाएँ अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिलती हैं। वर्तमान में देश में दिखाई दे रही गरीबी, बेरोज़गारी और महँगाई को उन्होंने पश्चिम के अंधानुकरण का परिणाम बताया। जैनाचार्य ने कहा कि भारत में ऋतुचक्र सदैव समयानुसार चलता था, परंतु प्रकृति के साथ किए गए अत्याचारों के कारण आज संतुलन बिगड़ रहा है। बाजार में मंदी–तेज़ी के उतार–चढ़ाव और वैश्विक आर्थिक उथल–पुथल के पीछे भी विदेशी शक्तियों की भूमिका बताई गई।
प्रवचन के दौरान उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “जो दूसरों का बुरा सोचता है, उसका बुरा स्वयं होता है।” उन्होंने अमेरिकी राजनीति का उल्लेख करते हुए कहा कि डोनाल्ड ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद से वैश्विक स्तर पर अस्थिरता बढ़ी है। ट्रम्प प्रशासन की टैरिफ नीतियों से भारत को भी नुकसान पहुँचा, इसके बावजूद भारतीय जनता की आत्मशक्ति और आत्मगौरव आज भी जीवंत है।
जैनाचार्य ने कहा कि धर्म का आश्रय लेकर ही भारतीय समाज अपने पुण्य को सुदृढ़ करता है। जब तक पुण्य समृद्ध रहता है, तब तक बड़ी से बड़ी आपत्ति भी व्यक्ति का कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
प्रवचन में जापान के प्राकृतिक खेती के समर्थक किसान फुकुओका का उल्लेख करते हुए बताया गया कि उन्होंने भारत आकर “डू नथिंग” का संदेश दिया था। उनका मत था कि भारत की शिक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, नारी व्यवस्था, आयुर्वेद और बाल संस्कार अत्यंत संतुलित व श्रेष्ठ हैं; इनमें अनावश्यक परिवर्तन आत्मघाती सिद्ध हो सकते हैं। जैनाचार्य ने चिंता व्यक्त की कि सत्ता के लोभ में कुछ लोगों ने इन मूल्यों को कमजोर करने का प्रयास किया, जिससे भारतीय संस्कृति डगमगाने लगी है।
अंत में उन्होंने संदेश दिया कि जो लोग धर्म से दृढ़ता से जुड़े रहेंगे, उन्हें किसी प्रकार की हानि नहीं होगी।



