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वराछा एल.एच. रोड स्थित श्री त्रिकमनगर जैन संघ में धर्मसभा सम्पन्न

आचार्य पद्मदर्शनसू‍रिजी का संदेश: सत्ता, संपत्ति और सौंदर्य जीवन का लक्ष्य नहीं—शील, सत्व और सदाचार ही मनुष्य की वास्तविक पूंजी

सूरत। वराछा एल.एच. रोड स्थित श्री त्रिकमनगर जैन संघ में पूज्य आचार्य श्री पद्मदर्शनसूरिजी महाराज और पूज्य मुनिश्री प्रेमदर्शनविजयजी महाराजश्री की पावन निश्रा में एक प्रेरक धर्मसभा का आयोजन किया गया। बड़ी संख्या में जैन समाजजन उपस्थित रहे।

धर्मसभा में आचार्यप्रवर पद्मदर्शनसूरिजी महाराज ने अमृतवाणी देते हुए कहा कि सत्ता, संपत्ति और सौंदर्य जीवन का सर्वस्व नहीं, बल्कि शील, सत्व और सदाचार ही मनुष्य की सर्वोत्तम पूंजी हैं। उन्होंने कहा कि सत्ता का सिंहासन बाहर से चाहे कितना आकर्षक लगे, परंतु वास्तव में वह कांटों से भरा होता है। पद मिलने के बाद मनुष्य के भीतर ‘अहंकार रूपी अजगर’ अक्सर फुफकार मारने लगता है।

उन्होंने कहा कि सत्ताधारी यदि जनता के सेवक बनकर रहेंगे, तभी लोगों का प्रेम प्राप्त कर सकेंगे, अन्यथा कुर्सी कभी स्थिर नहीं रहेगी।संपत्ति मिलने के बाद समाज में संप, स्नेह और सद्भाव लंबे समय तक नहीं टिक पाते। आज परिवारों और समाज में उत्पन्न तनावों को “धरतीकंप” बताते हुए उन्होंने कहा कि धन के अहंकार में लोग मानवधर्म भूलते जा रहे हैं।

आचार्यश्री ने कटाक्ष करते हुए कहा कि आज के धनी व्यक्तियों को न गरीब दिखते हैं, न झुग्गी—वे केवल फाइव-स्टार होटल, फार्महाउस, रो-हाउस, विशाल महलनुमा बंगले, महंगे रिसॉर्ट और करोड़ों के शादियों का तामझाम ही देखते हैं। मानवता के दीपक धीमे-धीमे बुझते जा रहे हैं और दानवता का अंधेरा बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि बाहरी सौंदर्य के लिए ब्यूटी पार्लर तो भरे पड़े हैं, लेकिन आंतरिक सौंदर्य समाप्त हो चुका है। जीवन के संघर्षों और चुनौतियों को सहने की क्षमता कमजोर हो रही है। इसलिए व्यक्ति को सत्व जागृत कर आचार तथा सद्गुणों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

धर्मसभा में मुनिश्री प्रेमदर्शनविजयजी ने कहा कि जीवन की वास्तविक सफलता के लिए पुण्य का बैंक बैलेंस, मन की मजबूती और प्रभुभक्ति का वातावरण मनुष्य के भीतर होना आवश्यक है। उन्होंने आग्रह किया कि अर्थ और काम की दौड़ में जीवन को नष्ट न करें, बल्कि धर्म और मोक्षपुरुषार्थ की दिशा में आगे बढ़ें।धर्मसभा के अंत में श्रद्धालुओं ने आचार्य एवं मुनिश्री की वाणी से जीवन मूल्यों का संकल्प लेते हुए लाभ लिया।

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