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अनित्य जीवन में करें धर्म का संचय : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

पूर्व सांसद व वर्तमान विधायक ने भी आचार्यश्री के किए दर्शन, प्राप्त किया आशीष

-12 कि.मी. का विहार कर प्रांतीज में पधारे तेरापंथ के वर्तमान महासूर्य

-प्रांतीजवासियों ने अपने आराध्य का किया भावभीना अभिनंदन

-आवर ऑन विद्याविहार में पावन प्रवास, साध्वीप्रमुखाजी ने भी जनता को किया उद्बोधित

09.11.2025, रविवार, ताजपुर, गांधीनगर (गुजरात) :जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना का कुशल नेतृत्व करते हुए गतिमान हो चुके हैं। भारत में शरद ऋतु का आगमन तो हो चुका है, किन्तु गुजरात के इन क्षेत्रों में अभी उसका प्रभाव नगण्य-सा है। रविवार को प्रातःकाल शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ ताजपुर में स्थित स्वामीनारायण इंस्टिट्यूट ऑफ नर्सिंग से मंगल प्रस्थान किया। स्वामीनारायण संप्रदाय के संत भी आचार्यश्री को विदा करने के लिए परिसर के बाहर तक साथ चले। सभी पर मंगल आशीष की वृष्टि करते हुए आचार्यश्री ने अगले गंतव्य की ओर प्रस्थान किया। लगभग बारह किलोमीटर का विहार कर शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी प्रांतीज की सीमा मंे पधारे तो वहां उपस्थित श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य का भावभीना अभिनंदन किया। बुलंद जयघोष के साथ श्रद्धालु स्वागत जुलूस के साथ आचार्यश्री के चरणों का अनुगमन करने लगे। आचार्यश्री सभी पर दोनों कर कमलों से आशीष वृष्टि कर रहे थे। एकदिवसीय प्रवास के लिए आचार्यश्री प्रांतीज स्थित आवर ऑन विद्याविहार में पधारे।

मुख्य मंगल प्रवचन में उपस्थित श्रद्धालु जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि इस जगत में नित्यता भी है तो अनित्यता भी है। आत्मा का स्वरूप नित्य है, लेकिन पर्याय परिवर्तन भी होता है जो अनित्य होता है। जो आदमी कभी बच्चा होता है, वह किशोर, जवान और फिर वृद्ध भी हो जाता है। एक मनुष्य जीवन में भी पर्याय का परिवर्तन होता है। इसी प्रकार गांव, शहर, अथवा अनेक जगहों का भी परिवर्तन होता रहता है। इसी प्रकार आदमी का जीवन भी अनित्य है और यह शरीर भी अनित्य है। कोई भी आदमी हो, कोई चक्रवर्ती हो या भीखारी हो, मृत्यु के संयोग से कोई बच नहीं सकता। तीर्थंकर भगवान की आत्मा भी कभी शरीर से मुक्त होकर मोक्ष में चली जाती है।

इसलिए कहा गया है कि यह शरीर, वैभव, धन-संपति सभी अशाश्वत है और मृत्यु प्रति क्षण निकट होती जा रही है, ऐसी स्थिति में आदमी को धर्म का संचय करने का प्रयास करना चाहिए। इस मानव जीवन में आदमी जितना धर्म का संचय कर सकता है, वह बहुत बड़ी पूंजी हो सकती है। जीवन का कोई पता नहीं होता कि कब किसका आयुष्य पूरा हो जाएगा। यह जीवन क्षणभंगुर है। इसलिए आदमी को अपने जीवन में धर्म करने का प्रयास करना चाहिए। अहिंसा, नैतिकता, सद्भावना व नशामुक्ति जीवन में रहे तो आत्मा निर्मल बन सकती है।

आज प्रांतीज में आना हुआ है। राजस्थान से आए तब भी प्रांतीज और गुजरात से राजस्थान जाना है तो तब भी प्रांतीज में आना हो गया है। यहां की ज्ञानशाला आदि विभिन्न धार्मिक-आध्यात्मिक गतिविधियां अच्छी चलें। यहां रहने वाले सभी लोगों में धार्मिकता के संस्कार रहें।आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीप्रमुखाजी ने भी समुपस्थित जनता को संबोधित किया। बालक सम्यक ने अपनी बालसुलभ प्रस्तुति दी। पूर्व सांसद श्री दीपसिंह राठौड़ ने भी आचार्यश्री के स्वागत में अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी। प्रांतीज ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। आचार्यश्री ने ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। गुजरात स्तरीय ज्ञानशाला की प्रशिक्षिक/प्रशिक्षिकाओं ने गीत का संगान किया। विद्याविहार के ट्रस्टी श्री रहिशभाई ने भी आचार्यश्री के स्वागत में अपनी अभिव्यक्ति दी। स्थानीय विधायक श्री गजेन्द्र सिंह ने आचार्यश्री के स्वागत में भावनाओं को अभिव्यक्ति दी और आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।

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