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मर्यादा के साथ जीवन निर्वाह करना भी तप कि श्रेणी में आता है-अजीत सागर महाराज

बुधवार को दिगंबर जैन मंदिर भट्टार में आयोजित धर्म सभा में प्रश्नमूर्ति अजीत सागर महाराज ने कहा कि पुण्योदय प्राप्त शरीर को महातप में लगाना ही मानवता है, इच्छाओं की पूर्ति के लिए किया गया उपवास तप नहीं कहलाता है ,सबसे बड़ा तप है अपनी गलती को स्वीकार करना और अंतरंग में पश्चातताप करना। कषायों का त्याग करना ही श्रेष्ठ तप है ,विनय तप कर्म निर्जरा एवं उच्च गोत्र का भी कारण है ।आज हम भोजन के त्याग को ही तप मानते हैं, पर यही उत्तम तप नहीं है बल्कि महापुरुषों एवं गुरु भगवंतों का विनय करना भी उत्तम तप कि श्रेणी में आता है। चिंतन करो कि जब हमारा शरीर ही हमारे साथ नहीं जाता है, तब संचित वैभव भी साथ में कैसे जायेगा। अतः क्षणिक सुख के लिए इच्छा पूर्ति करना भविष्य के दुख का कारण है। मर्यादा के साथ में जीवन निर्वाह करना एवं प्रभु व गुरु की आज्ञा का पालन भी ध्यान तप है|

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