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श्री उमरा जैन संघ में 435 वर्षीतप का अनुपम दृश्य, 13 से 85 वर्ष तक के तपस्वी कर रहे 400 दिनों का तप

उमरा।श्री उमरा जैन संघ में इस समय 435 वर्षीतप चल रहे हैं, जहाँ सामूहिक वर्षीतप कर रहे तपस्वियों का दृश्य अत्यंत प्रेरणादायी और अद्भुत बन गया है। 13 वर्ष के बालक से लेकर 85 वर्ष के वृद्ध तक, सभी आयु वर्ग के तपस्वी पूरे 400 दिनों का कठोर तप हर्ष, उल्लास और श्रद्धा के साथ पूर्ण कर रहे हैं।
इस आयोजन की विशेष बात यह है कि जहाँ आज समाज में हर स्थान पर सेवा कार्यों के लिए वेतनभोगी व्यवस्था दिखाई देती है, वहीं श्री उमरा जैन संघ में संघ के तरुण युवक स्वयं दौड़-दौड़कर तपस्वियों की भक्ति एवं सेवा कर रहे हैं। इस निस्वार्थ सेवा भावना ने पूरे धार्मिक वातावरण को और भी पावन बना दिया है।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए पद्मदर्शनसूरि जी महाराज ने अपने मांगलिक प्रवचन में कहा कि,“वेटर द्वारा भोजन परोसा जाना और जैन युवाओं द्वारा भक्ति भाव से तपस्वियों की सेवा किया जाना—इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। जैसे माँ के हाथ से बना भोजन संतानों को जो स्वाद देता है, वह किसी और में नहीं हो सकता।”
पूज्य आचार्यश्री ने कहा कि,“जिस पर अनुशासन किया जा सके वही शासित कहलाता है। आज समस्या यह है कि सुनाने वाले बहुत हैं, पर सुनने वाले कम। मनुष्य स्वयं अपने मन का राजा बन बैठा है। यदि मन पर नियंत्रण नहीं होगा तो समाज में भारी अव्यवस्था उत्पन्न होगी।”उन्होंने आगे कहा कि आज अर्थ और काम के अत्यधिक आकर्षण ने जनमानस को विचलित कर दिया है। यदि जीवन में धर्म और मोक्ष पुरुषार्थ को स्थान नहीं मिलेगा, तो सच्ची सद्गति प्राप्त करना कठिन हो जाएगा।“धन पुरुषार्थ से भी अधिक आवश्यक है धर्म पुरुषार्थ,” ऐसा संदेश देते हुए पूज्यश्री ने

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