आत्मा को केन्द्र बिन्दु बनाएं-आचार्य शिवमुनि

सूरत।आत्मा को केन्द्र बिन्दु बनाएं
आचार्य भगवन् ने दैनिक उद्बोधन में पूज्यपाद कृत समाधि तंत्र की श्रृंखला में फरमाया कि आत्मा के स्वरूप को नहीं समझने वाला व्यक्ति अपनी और दूसरे की देह को अपनी आत्मा मान लेता है। मेरा पुत्र है, मेरा धन है, मेरी सम्पति है, मेरी गाड़ी-बंगला आदि अपने व्यक्तित्व के पोषण में ही वह अपना पूरा जीवन लगा देता है।
उन्होंने आगे फरमाया कि व्यक्ति विचार करे कि परिवार एक संयोग से मिला है। परिवार व समाज में अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए वह मुख्यता अपनी आत्मा को देता है तो वह आत्मार्थी है और वह मोह मिथ्यात्व से दूर रहते हुए अपने कर्मों को निर्जरित करता है। इसलिए हर व्यक्ति अपनी आत्मा को केन्द्र बिन्दु में रखे और आत्मा के स्वरूप को समझे कि आत्मा अलग है शरीर अलग है, जैसे रहने के लिए मकान अलग है और उस मकान में रहने वाला व्यक्ति अलग है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि अनादिकाल के मिथ्यात्व के कारण शरीर को अपना मानना सबसे बड़ा मिथ्यात्व है जब तक इसे नहीं तोड़ेंगे तब तक आगे नहीं बढ़ सकते। केन्द्र बिन्दु आत्मा है, तो कर्म नहीं लगता है इसे समझना चाहिए।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि पुण्य और पाप दोनों ही कर्म बंध है। पाप करता है तो पाप का कर्म बंधन होता है और पुण्य करता है तो पुण्य का कर्म बंधन होता है। संसारी आदमी पुण्य को धर्म मानता है वह आत्मा तक पहुंचता नहीं है। साता वेदनीय अर्थात शरीर का सुख शहद लगी हुई तलवार के समान है। साता के पीछे असाता छुपी हुई है। व्यक्ति अधिकांश प्रार्थना अपने शरीर की अनुकूलता के लिए, इच्छाओं की पूर्ति के लिए करता है। वह आध्यात्मिक भाषा में याचक बना रहता है। अपने स्वरूप को भूलकर पुद्गलों की प्रार्थना कर रहा है। एक कामना पूरी होती है तो दूसरी कामना, दूसरी पूरी होती है तो फिर तीसरी इस तरह आगे से आगे आकांक्षा बढ़ती रहती है।
मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘अब सौंप दिया इस जीवन को भगवान तुम्हारे चरणों में’’ भजन की प्रस्तुति दी।
ऑनलाईन के माध्यम से तपस्या करने वाले तपस्वियों ने उपवास, एकासन, आयंबिल का प्रत्याख्यान लिया।
आचार्य भगवन के दर्शनार्थ सिरसा, वापी, उदयपुर से श्रद्धालु गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए।




