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फलते-फूलते और खूब विकास करते रहें युवाचार्य : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

साध्वीवर्याजी ने भी युवाचार्यश्री को किया वर्धापित

साधु, साध्वी, समणीवृंद, मुमुक्षुवृंद आदि ने दी विभिन्न प्रस्तुतियां

कई घंटों तक चला वर्धापना कार्यक्रम

आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को प्रदान की बक्सीस  31.07.2026, शुक्रवार, लाडनूं :

युवाचार्य वर्धापना समारोह का दूसरा व अंतिम दिन। मानों सम्पूर्ण तेरापंथ धर्मसंघ ने अपने नव मनोनीत युवाचार्यश्री की वर्धापना में उमड़ आया। जी हां! शुक्रवार को सुधर्मा सभा में युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी की वर्धापना में चतुर्विध धर्मसंघ की प्रस्तुतियों का जो क्रम प्रारम्भ हुआ, वह कई घंटों तक चलता रहा।

शुक्रवार को सुधर्मा सभा में आयोजित आज के प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के साथ युवाचार्य वर्धापना समारोह का दूसरा और अंतिम दिवस था। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘तप से तापस होता है’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि समता से आदमी समण, श्रमण बनता है, ब्रह्मचर्य से ब्राह्मण बनता है, ज्ञान से मुनि बनता है और तप से तापस बनता है। जीवन में तप की तेजस्विता होती है तो वह भी एक उपलब्धि है। मनुष्य जीवन में कई प्रकार की लब्धियां, ऋद्धियां, सिद्धियां प्राप्त हो सकती हैं। एक आदमी में बौद्धिक क्षमता अच्छी है। विद्वता अच्छी और बुद्धि भी अच्छी होती है। यह भी एक प्रकार की विशेष उपलब्धि होती है।

विद्वता और बुद्धिमत्ता ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से संबद्ध है। विद्वता और बुद्धिमत्ता जीवन की एक उपलब्धि होती है। दूसरी लब्धि होती है सत्ता और वर्चस्विता। आदमी में इतना तेज है, पुण्य का योग है कि उसे सत्ता और वर्चस्विता मिल जाए। किसी को सत्ता मिल जाए, कोई पद मिल जाए, राजनीति में कोई सत्ता में आए। तीसरा युग्म है धनिता और स्वस्थता। कोई खूब धनवान बन जाए, खूब धन मिल जाए। किसी को अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त होता है। अच्छा स्वास्थ्य का मिलना भी एक उपलब्धि होती है। धनिता का होना भी गृहस्थ जीवन की एक उपलब्धि होती है। शारीरिक जीवन की अनुकूलता बहुत अच्छी बात होती है। गृहस्थ हो अथवा साधु स्वास्थ्य की अनुकूलता भी उपलब्धि है। पुण्य का उदय होता है तो आदमी को अनुकूल स्थितियां मिलती हैं। शरीर, प्रतिष्ठा, मान-सम्मान मिलता है। जीवन में भाग्य का भी अपना कार्य होता है।

आदमी के जीवन में तप कितना है, इसका भी ध्यान रखने का प्रयास करना चाहिए। बाह्य तप का भी अपना प्रभाव होता है। साधु अपने आपको संयम और तप से अपने आपको भावित करता है। सेवा करना भी एक तप है। जितना संभव हो सके आदमी को तप करने का प्रयास करना चाहिए। उपवास करना ही नहीं, सेवा करना, साधना करना आदि भी तप के ही रूप होते हैं। किसी को ज्ञान का दान देना भी एक प्रकार की तपस्या होती है। कौन-सा तप किसके अनुकूल है, यह विवेक की बात होती है। क्षेत्र और काल भी अपना महत्त्व होता है। युवाचार्य महावीर ने सेवा का कार्य भी किया है। हर साधु-साध्वी अग्रणी को महावीर जैसा सहवर्ती मिलना भी मानों भाग्य की बात होती है। हर किसी को महावीर जैसा मिल जाना भाग्य की बात होती है। हर अग्रणी को महावीर जैसा मिल जाए, लेकिन भाग्य के बिना ऐसा होना संभव नहीं। श्रम करना भी एक प्रकार का तप है। शासन-प्रशासन का कार्य भी एक प्रकार से सेवा का कार्य होता है। साध्वीप्रमुखाजी व साध्वीवर्या भी सेवा के कार्य से जुड़े हुए हैं। आचार्य के बाद युवाचार्य होते हैं। आचार्य व युवाचार्य का साथ होना भी बहुत अच्छा अवसर है। गुरु छाया व आसपास रहना बहुत भाग्य की बात होती है। युवाचार्य महावीर को स्वाध्याय का जितना समय मिलता जाए तो ज्ञान और पुष्ट हो सकता है। कहीं संघीय कार्यों में ज्यादा सक्रिय होना पड़ जाए तो भी समय लगाया जा सकता है। हालांकि पहले मुख्यमुनि के रूप में जुड़े हुए हैं ही। पिछले कई वर्षों संदेश लिखने आदि का कार्य तो करते रहें हैं। अभी नैकट्य और ऊर्ध्वारोहण की स्थिति में आ गया है। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के अनुसार यथावसर युवाचार्य तैयार रहें कि ज्यादा अपेक्षा हो तो भी और कम अपेक्षा हो तो भी हम तैयार रहें। युवाचार्य महावीर की मानसिक समाधि बनी रहे, खूब सक्रियता बनी रहे। जहां जितनी आवश्यकता हो, अपना स्वाध्याय, व्याख्यान का अभ्यास-प्रयास होता रहे। शासन-प्रशासन के कार्यों पर दृष्टि रहे। किसी कार्य में और क्या परिष्कार किया जा सकता है, इसका भी ध्यान देना अपेक्षित है। एक युवाचार्य का उचित समय पर हो जाना भी बहुत अच्छा होता है। यह आचार्य के लिए बड़े आलम्बन की बात हो सकती है। युवाचार्य महावीर खूब स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए, समाधि बनी रहे, खूब मनोबल, विनम्रता आदि का विकास होता रहे, खूब आगे बढ़ते रहें, फलते-फूलते रहें, खूब अच्छा विकास होता रहे।                                         

आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने युवाचार्यश्री की वर्धापना में अपनी अभिव्यक्ति देते हुए गीत का भी संगान किया। शासन गौरव साध्वी कनकश्रीजी (लाडनूं), शासन गौरव साध्वी कल्पलताजी, शासनश्री साध्वी जिनप्रभाजी, साध्वी चरितार्थप्रभाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। मुनिवृंद ने भी युवाचार्यश्री की वर्धापना में गीत का संगान किया। मुमुक्षु बहनों ने भी गीत का संगान किया। युवाचार्यश्री के संसारपक्षीय भाई लोकेश कोचर ने अपनी अभिव्यक्ति दी। साध्वियों के टीएफ फोर्स ने अपनी प्रस्तुति दी। साध्वी शुभ्रयशाजी, साध्वी कनकरेखाजी, साध्वी उज्जवलप्रभाजी, साध्वी स्वर्णरेखाजी, साध्वी गवेषणाश्रीजी, साध्वी सम्पूर्णयशाजी, साध्वी संघप्रभाजी, साध्वी उज्जवलरेखाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। युवाचार्य के सहदीक्षित साध्वियों ने गीत का संगान किया। मुनि राजकुमारजी ने गीत का संगान किया। मुनि सुमतिकुमारजी, मुनि अर्हतकुमारजी, मुनि धर्मेशकुमारजी, मुनि देवेन्द्रकुमारजी, मुनि रजनीशकुमारजी, मुनि योगेशकुमारजी, मुनि कीर्तिकुमारजी, मुनि पृथ्वीराजजी, मुनि विश्रुतकुमारजी, मुनि वर्धमानकुमारजी, मुनि निकुंजकुमारजी, मुनि नमनकुमारजी, मुनि विनम्रकुमारजी, मुनि नम्रकुमारजी, मुनि अक्षयप्रकाशजी, मुनि मेघकुमारजी, मुनि अर्हमकुमारजी, मुनि आर्षकुमारजी, मुनि चन्द्रप्रभजी, मुनि अमनकुमारजी, मुनि केशीकुमारजी, मुनि ऋषिकुमारजी, मुनि ध्रुवकुमारजी, मुनि चिन्मयकुमारजी, मुनि मृदुकुमारजी, मुनि सिद्धकुमारजी, मुनि पार्श्वकुमारजी, मुनि मार्दवकुमारजी, मुनि रत्नेशकुमारजी, मुमुक्षु जहान और लखित ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। श्री वीरचन्द कोचर ने अपनी अभिव्यक्ति दी। समणी निर्मलप्रज्ञाजी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ टाइम्स का विशेषांक अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद आदि के पदाधिकारियों के द्वारा आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया गया। आचार्यश्री ने स्वाध्याय की बक्सीस के साथ विगय आदि के संदर्भ में एक वर्ष की बक्सीस प्रदान की।

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