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अनासक्त रहे साधु : महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्यश्री ने ‘मूर्च्छा परिग्रह है’ विषय को किया व्याख्यायित

मुनि आत्मानंदजी की स्मृति सभा का हुआ आयोजन

सघन साधना शिविर सुसम्पन्न, शिविरार्थियों को मिला शांतिदूत से मंगल आशीष

30.05.2026, शनिवार, लाडनूं :

शनिवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘मूर्च्छा परिग्रह है’ के आधार पर पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि मूर्च्छा परिग्रह है। श्रमण के पंच महाव्रत वाले धर्म में पांचवां महाव्रत है सर्व परिग्रह विरमण महाव्रत। साधु परिग्रह से विरत रहे। दुनिया में घर, मकान, दुकान, सम्पत्ति, रुपया, पैसा, आभूषण आदि के रूप में परिग्रह होता है। ये पुद्गल हैं, ये कर्म का बंधन नहीं कराते। इनके साथ मूर्च्छा का भाव जुड़ता है, वह मूर्च्छा परिग्रह हो जाती है। मूर्च्छा ही परिग्रह है। साधु को अपरिग्रही होना चाहिए। साधु वस्त्र आदि का उपयोग भी करना होता है तो उसका सीमाकरण भी किया जाता है।

साधु को अपने इस पंच महाव्रत के लिए जागरूकता बनी रहनी चाहिए। साधु को कभी भी परिग्रह में नहीं जाना चाहिए। साधु को धन आदि के प्रति अनासक्त का भाव रखना चाहिए। पूरा संसार ही धन, सोना, आदि के मोह में फंसा हुआ है। साधु इससे विरत होता है, इसलिए वह पूजनीय होता है। आसक्ति अपिग्रह की साधना में बाधक बन सकती है। साधु को अपरिग्रह की चेतना को पुष्ट बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।

आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में चारित्रात्माओं को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि चतुर्दशी का क्रम केवल गुरुकुलवास में ही नहीं, न्यारा में रहने वाले साधु-साध्वियों में चलना चाहिए। विहार आदि हो तो भी समय लगते सभी साधु-साध्वी एक जगह एकत्रित होकर हाजरी का वाचन कर लेना चाहिए। परिषद न भी तो भी हाजरी और मर्यादावली का वाचन कर लेने का प्रयास करना चाहिए। व्याख्यान आदि हो तो उस समय भी चारित्रात्माएं उपस्थित होकर हाजरी का क्रम सम्पन्न कर लेना चाहिए।

आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी का वाचन किया। तदुपरान्त उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र उच्चरित किया। हाजरी के क्रम के उपरान्त युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में शुक्रवार को दिवगंत हुए मुनि आत्मानंदजी की स्मृतिसभा का उपक्रम रहा। मुनि आत्मानंदजी आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में सन् 2013 में बीदासर में आयोजित बृहद् दीक्षा समारोह में आचार्यश्री से ही दीक्षित हुए थे और शुक्रवार को आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में ही उनका प्रयाण हो गया। उनकी स्मृति सभा में सर्वप्रथम मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने उनके आत्मा के ऊर्ध्वारोहण के प्रति मंगलकामना की।

तदुपरान्त युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उनके संदर्भ में संक्षिप्त जानकारी देते हुए उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की। आचार्यश्री के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने चार लोगस्स का ध्यान किया। तत्पश्चात साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने भी उनकी आत्मा के प्रति मध्यस्थ भावना अभिव्यक्त की। मुनि कमलकुमारजी, मुनि श्रेयांशकुमारजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। मुनि आत्मानंदजी के संसारपक्षीय पुत्र श्री विनोद डागा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।

आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा द्वारा आयोजित नौदिवसीय सघन साधना शिविर की सम्पन्नता के संदर्भ में मंचीय उपक्रम में सर्वप्रथम श्रीमती मधु देरासरिया ने अपनी अभिव्यक्ति दी। बालिका ख्वाइश पुगलिया ने शिविरकालीन अनुभवों को प्रस्तुति दी। महासभा की ओर से श्री डूंगरमल सालेचा ने अपनी विचाराभिव्यक्ति दी। शिविर के शिविरार्थी बालकों ने अपनी प्रस्तुति दी। शिविरार्थी विपीन ने भी अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया। शिविरार्थी बालिकाओं ने गीत का संगान किया।

युगप्रधान अनुशास्ता ने शिविरार्थियों को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि सघन साधना शिविर का यह उपक्रम गुरुकुलवास में कुछ अर्से से चल रहा है। यह शिविर योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत लगा है। यह बच्चों की एक फुलवारी-सी है। यह सघन साधना शिविर के अनुरूप साधना चली है। मुख्यमुनि व साध्वीवर्या इसके लिए मुख्य जिम्मेदार हैं। अच्छी व्यवस्था है। इसकी शृंखला अच्छी तरह आगे बढ़े। तेरापंथी महासभा का तत्त्वावधान है। छोटी उम्र के बालक-बालिकाएं हैं, उनके भाव, जिज्ञासा, वंदना आदि बहुत अच्छी बात है। खूब अच्छा विकास होता रहे।

श्री सूरजमल नाहटा ने मुनि आत्मानंदजी के प्रति अपनी अभिव्यक्ति दी। अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी प्रश्न पुस्तिका आदि लोकार्पित की गई।

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