राजस्थानसामाजिक/ धार्मिक

कर्तव्य के प्रति जागरूक रहने वाला सुविनीत शिष्य : युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण

- उत्तराध्ययन आगम आधारित योगक्षेम वर्ष व्याख्यानमाला

24.03.2026, मंगलवार, लाडनूं:योगक्षेम वर्ष के पावन अवसर पर राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती परिसर में अपार आध्यात्मिक उल्लास छाया हुआ है। मंगलवार सुबह सुधर्मा सभा के विशाल सभागार में जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सानिध्य में मुख्य प्रवचन कार्यक्रम आयोजित हुआ। चतुर्विध संघ की अपार श्रद्धा से भरे इस भव्य आयोजन का शुभारंभ युगप्रधान आचार्य श्री द्वारा मंगल महामंत्रोच्चार के साथ किया गया। इसके उपरांत साध्वीवृंद ने अपने प्रज्ञा गीत के संगम से इस भक्तिमय वातावरण को और भी गुंजायमान कर दिया। प्रवचनोपरांत प्रश्नोत्तर का क्रम भी चला जिसमें गुरुदेव द्वारा प्राप्त समाधान से साधु साध्वियों ने अपनी जिज्ञासाओं को समाहित किया।

युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अपने मंगल प्रवचन में उत्तराध्ययन आगम सूक्त का विवेचन करते हुए फरमाया कि एक विनीत और समझदार शिष्य वही है, जो केवल आचार्य के वचनों को ही नहीं, बल्कि उनके मन की इच्छाओं और भीतरी इंगित, मनोगत भाव को भी भली-भांति समझ लेता है। यदि कभी मन में कोई शंका हो, तो शिष्य को अवसर देखकर नम्रतापूर्वक अपने गुरु से पूछ लेना चाहिए कि, गुरुदेव, इस विषय में आपकी क्या मर्जी और मार्गदर्शन है? जब शिष्य गुरु के मनोगत या वाक्यगत भाव को जान ले, तो वह केवल सुनकर ही न रह जाए, बल्कि उसे वाणी से स्वीकार करे। गुरू की आज्ञा को तहेत कहकर स्वीकार करना चाहिए। सुविनीत शिष्य वही होता है जो अपने आचरण और कर्म में गुरु की आज्ञा को पूर्णतः परिणत कर लेता है। गुरु द्वारा सौंपे गए कार्य को शिष्य समय पर और इतनी निष्ठा से पूरा करे कि आचार्य के दोबारा पूछने से पूर्व ही वह निवेदन कर दे कि कार्य सफलतापूर्वक संपन्न हो गया है। हमारे धर्मसंघ में यह विनय परंपरा अत्यंत उन्नत है, जहाँ शिष्य अपने गुरु के भावों को समझकर उन्हें तुरंत क्रियान्वित करने के लिए सदैव सचेष्ट रहता है।

धर्मसंघ की व्यवस्था, मैनेजमेंट और प्रबंधन पर प्रकाश डालते हुए गुरुदेव ने फरमाया कि जो मुखिया होते हैं, उनका भी यह विशेष दायित्व है कि वे सौंपे गए कार्यों की बीच-बीच में पूछताछ करते रहें, जिससे कार्य में गति आए और वह निर्धारित समय पर पूरा हो सके। व्यवहार प्रशिक्षण का एक और महत्वपूर्ण बिंदु समझाते हुए आचार्य श्री ने कहा कि संगठन में अनेक शिष्य होते हैं, परंतु सबसे बड़ी सेवा वही करते हैं जो अपने कार्यों और दायित्वों के प्रति पूर्णतः समर्पित होते हैं। उम्र या स्वास्थ्य के कारण भले ही कोई शारीरिक भागदौड़ न कर सके, किंतु अपने अनुभव, पैने चिंतन और उचित मार्गदर्शन से संघ के कार्यों को समय पर दिशा देने में उनका वह योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

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