प्रामाणिकता जीवन की सबसे बड़ी पूंजी : युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण
- क्षमा, सरलता युक्त जीवन जीने हेतु गुरुदेव ने किया प्रेरित

23.03.2026, सोमवार, लाडनूं:जैन विश्व भारती लाडनूं में योगक्षेम वर्ष सानंद गतिमान है। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी द्वारा आज सुधर्मा सभा में ‘वह करे जो बुद्धों ने किया’ विषय पर मुख्य प्रवचन हुआ। गुरुदेव द्वारा आगम वांग्मय का श्रवण कर श्रोतागण जैन तात्विक ज्ञान की गहराइयों में गोते लगा रहे है। इसी के साथ अणुव्रत एवं तत्वज्ञान की कक्षाएं नियमित रूप से आयोजित हो रही है।

परम पावन आचार्यश्री ने जीवन में धर्मार्जित व्यवहार का महत्व समझाते हुए फरमाया कि हमारा व्यवहार आगम के दिशा-निर्देशों के अनुरूप और क्षमा, मार्दव, सरलता व निर्लोभता जैसे गुणों से युक्त होना चाहिए। प्रामाणिकता जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होती है, चाहे वह चिंतन में हो, वचनों में हो या कार्यों में हो। जिस प्रकार हमारे परम आराध्य स्वामी भिक्षु का नाम रोम-रोम में बसा होता है, उसी प्रकार हमारे भीतर सत्य और प्रामाणिकता के प्रति गहरी निष्ठा होनी चाहिए। जिसके हृदय में सच्चाई का वास होता है, वहां साक्षात प्रभु का निवास होता है। मनुष्य को जीवन में चाहे कितने भी कष्ट या अपमान सहने पड़ें, परंतु उसे अपनी प्रामाणिकता और सच्चाई का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

गुरुदेव ने प्रामाणिक व्यवहार, विनम्र व्यवहार, मृदु व्यवहार, जागरूक व्यवहार और संघ निष्ठा के बारे में बताते हुए आगे कहा कि छोटों को बड़ों का सम्मान करना चाहिए और आवश्यकतानुसार प्रोटोकॉल व लोकोपचार का पालन करते हुए अपनी वाणी व आचरण में मृदुता रखनी चाहिए। इसके साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्य के प्रति पूर्णतः जागरूक रहना चाहिए, चाहे वह गोचरी का दायित्व हो या अन्य व्यवस्था का। धर्म संघ के सदस्यों को संघ की गरिमा के अनुकूल ही आचरण करना चाहिए और परस्पर संवाद द्वारा सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाना चाहिए। जो व्यक्ति बुद्धों, मनीषियों और तत्वज्ञों द्वारा बताए गए इस धर्मार्जित व्यवहार के मार्ग पर चलता है, वह कभी भी निंदा को प्राप्त नहीं होता।




