
सूरत। टेक्सटाइल उद्योग वर्तमान में गंभीर मंदी के दौर से गुजर रहा है। यार्न समेत अन्य कच्चे माल की कीमतों में लगातार वृद्धि होने से कपड़ा उत्पादन की लागत काफी बढ़ गई है, जबकि देश की विभिन्न मंडियों में फिनिश्ड कपड़े की मांग बेहद कमजोर बनी हुई है। इसके चलते ग्रे कपड़े की मांग घटकर महज 20 प्रतिशत रह गई है। बाजार में खरीदारी नहीं होने से व्यापारी उत्पादन लागत से भी कम कीमत पर ग्रे कपड़े की मांग कर रहे हैं, जिससे वीवर्स की स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है।
कपड़ा बाजार में आई इस अभूतपूर्व मंदी का सबसे अधिक असर वीविंग उद्योग पर पड़ा है। यूनिट संचालकों के लिए कारखानों को चालू रखना ही बड़ी चुनौती बन गया है। श्रमिकों की कमी के कारण अधिकांश इकाइयां अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही हैं। बड़ी संख्या में वीविंग यूनिट केवल एक पाली में संचालित हो रही हैं तथा सप्ताह में दो दिन अनिवार्य अवकाश रखना पड़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप उत्पादन में भारी गिरावट आई है।
उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार पूरे टेक्सटाइल हब में उत्पादन घटकर 40 से 50 प्रतिशत तक सिमट गया है। ऐसी स्थिति में कारखानों के दैनिक खर्च, बैंक ब्याज और श्रमिकों के वेतन का भुगतान करना वीवर्स के लिए मुश्किल होता जा रहा है। नकदी संकट के कारण कई छोटे और मध्यम वीवर्स कारखाने बंद होने से बचाने तथा आवश्यक खर्चों की पूर्ति के लिए नुकसान उठाकर भी उत्पादन लागत से कम कीमत पर ग्रे कपड़ा बेचने को मजबूर हैं।
वीवर अतुल पटेल ने बताया कि वर्तमान समय में मांग की समस्या के साथ-साथ भुगतान की समस्या भी गंभीर होती जा रही है। पहले व्यापारियों से 45 से 55 दिनों में भुगतान मिल जाता था, लेकिन अब भुगतान प्राप्त करने के लिए 120 से 150 दिनों तक इंतजार करना पड़ रहा है। लंबे समय तक रकम फंसी रहने से वर्किंग कैपिटल पर भारी दबाव पड़ रहा है, जिससे वीविंग इकाइयों का संचालन लगातार कठिन होता जा रहा है।




