सरकारी बकाया वसूली के लिए बैंक खाते सीज तक कर देता है विभाग, लेकिन व्यापारियों की जमा राशि लौटाने में नहीं दिखाता तत्परता
सूरत। जीएसटी लागू होने से पहले राज्य सरकार द्वारा कर वसूली के लिए व्यापारियों को वेट (VAT) नंबर लेना अनिवार्य था। वेट नंबर प्राप्त करने के लिए व्यापारियों से 20 हजार रुपये की राशि जमा कराई जाती थी। नियम के अनुसार यह राशि दो वर्ष बाद बिना ब्याज के वापस कर दी जानी थी, लेकिन बड़ी संख्या में व्यापारियों को आज तक उनकी जमा राशि वापस नहीं मिल सकी है।
वेट नंबर लेते समय व्यापारियों को चालान के माध्यम से राशि जमा करानी पड़ती थी। इसके लिए चार प्रतियों वाला चालान बनाया जाता था। इनमें से दो प्रतियां बैंक के पास रहती थीं, एक प्रति विभाग को जमा कराई जाती थी और एक प्रति व्यापारी अपने पास रखता था। नियम के अनुसार वेट नंबर लेने के दो वर्ष बाद व्यापारी आवेदन कर अपनी जमा राशि वापस प्राप्त कर सकते थे।
जानकारों के अनुसार कई व्यापारी ऐसे हैं जो राशि जमा कराने के बाद उसे वापस लेना भूल गए, जबकि कुछ व्यापारियों के चालान समय के साथ गुम हो गए। ऐसे अनेक व्यापारियों को यह जानकारी भी नहीं है कि उनकी जमा राशि आज भी विभाग के पास पड़ी हुई है।
व्यापारिक संगठनों का कहना है कि विभाग के पास जमा राशि का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध है, फिर भी राशि लौटाने की दिशा में कोई सक्रिय पहल नहीं की जा रही है। यदि विभाग स्वयं ऐसे व्यापारियों की पहचान कर राशि लौटाने की प्रक्रिया शुरू करे तो हजारों व्यापारियों को राहत मिल सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जिन व्यापारियों के पास मूल दस्तावेज या चालान उपलब्ध नहीं हैं, उनसे शपथ पत्र (एफिडेविट) लेकर भी राशि लौटाने की व्यवस्था की जा सकती है।
व्यापारियों का कहना है कि जब सरकार को किसी व्यक्ति या व्यापारी से बकाया राशि वसूलनी होती है तो नोटिस पर नोटिस भेजे जाते हैं और आवश्यकता पड़ने पर बैंक खाते तक सीज कर दिए जाते हैं। ऐसे में विभाग के पास वर्षों से जमा व्यापारियों की राशि लौटाने में दिखाई जा रही उदासीनता पर भी पुनर्विचार किया जाना चाहिए।यह समाचार समाचार-पत्र शैली में तैयार किया गया है, जिसमें शीर्षक, उपशीर्षक और तथ्यात्मक विवरण शामिल हैं।




