भीष्म स्तुति और राजा परीक्षित प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन

SURAT;श्री रामायण प्रचार मण्डल द्वारा आयोजित आशा नगर उधना सूरत में चल रही श्रीमद भागवत कथा में सोमवार 18 मई को दूसरे दिन कथा वाचन के दौरान कथावाचक संदीप महाराज ने भीष्म स्तुति और राजा परीक्षित के प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया।
कथा में बताया गया कि भीष्म पितामह ने अपनी बुद्धि रूपी कन्या का विवाह भगवान श्रीकृष्ण के साथ किया था। महाभारत युद्ध के बाद भीष्म पितामह छह महीने तक बाणों की शय्या पर लेटे रहे और सूर्य के उत्तरायण होने पर अपने प्राण त्याग दिए।
संदीप महाराज ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने माता कुंती से कुछ मांगने को कहा, लेकिन कुंती ने कोई सांसारिक वस्तु नहीं मांगी। उन्होंने भगवान से कहा कि यदि देना ही है तो दुख दीजिए, क्योंकि दुख में ही मनुष्य बार-बार भगवान को याद करता है, जबकि सुख मिलने पर वह प्रभु को भूल जाता है।
कथा के दौरान आगे बताया गया कि युधिष्ठिर सहित पांडव स्वर्ग को चले गए और राजा परीक्षित हस्तिनापुर के राजा बने। उनके राज्य में कोई भी व्यक्ति दुखी नहीं रहता था। एक बार वन भ्रमण के दौरान राजा परीक्षित को एक काले रंग का पुरुष मिला, जिसने स्वयं को कलियुग बताया। राजा ने कलियुग को सोना, हिंसा, मदिरा और जुए में रहने का स्थान दिया।
इसके बाद सोने का मुकुट पहनकर शिकार पर निकले राजा परीक्षित ने तपस्या कर रहे ऋषि के गले में मृत सांप डाल दिया। ऋषि पुत्र ने यह देखकर क्रोधित होकर श्राप दिया कि जिसने यह अपमान किया है उसे सातवें दिन सर्प डसेगा।
श्राप का पता चलने पर राजा परीक्षित अपनी पत्नी के साथ गंगा तट पहुंचे, जहां सुखदेव जी महाराज का आगमन हुआ। उन्होंने राजा परीक्षित को श्रीमद भागवत कथा सुनाई, जिसके श्रवण से राजा परीक्षित को मोक्ष की प्राप्ति हुई।




