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वैराग्य, संयम और साधना से भीतरी सुख की प्राप्ति : शान्तिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

-साध्वीवर्याजी के ग्यारहवें मनोनयन दिवस, आचार्यश्री ने दिया मंगल आशीष

14.05.2026, गुरुवार, लाडनूं :जैन विश्व भारती, लाडनूं का सुरम्य परिसर इन दिनों युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के योगक्षेम वर्ष प्रवास के मंगल आयोजनों से गुंजायमान है। आज का दिन चतुर्विध धर्मसंघ के लिए एक विशेष प्रसंग लेकर आया, क्योंकि आज जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ की साध्वीवर्या संबुद्धयशा जी का 11वां मनोनयन दिवस मनाया गया। आशीर्वचन फरमाते हुए गुरुदेव ने कहा कि आज ज्येष्ठ कृष्णा द्वादशी के दिन साध्वीवर्या संबुद्धयशा जी की नियुक्ति को पूरा एक दशक संपन्न हो गया है। 10 वर्ष पूर्व असम यात्रा के दौरान इन्हें इस महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया गया था। साध्वीवर्या अपने ज्ञान, दर्शन, चारित्र और सेवा की भावना का खूब अच्छा विकास करें तथा मन में निरंतर समाधि बनाए रखें। जो भी उचित सेवा का कार्य मिले, उसे बिना किसी प्रमाद या आलस्य के संपन्न करें, लेकिन इसके साथ ही अपने स्वास्थ्य का भी पूरा ध्यान रखें, ताकि इसी तरह निर्बाध रूप से उनका निरंतर आत्मिक विकास होता रहे।
इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने संस्मरणों का उल्लेख किया। मुनि श्री कमल कुमार जी, शासन गौरव साध्वी कनकश्री जी और समण नियोजिका अपनी मंगल भावनाएं प्रस्तुत कीं।

मुख्य प्रवचन में शान्तिदूत आचार्यप्रवर ने भौतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण के मध्य गहरे अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि इंद्रिय विषयों के जगत में आसक्ति और राग की प्रगाढ़ता से जो सुख भोगा जाता है, वह नश्वर है और पारमार्थिक दृष्टि से वह दुख का ही एक रूप है। इसके विपरीत, जिस जीवन में इंद्रिय विषयों के प्रति आकर्षण नहीं होता, बल्कि त्याग, वैराग्य, संयम और साधना होती है, वहां वास्तविक भीतरी सुख उपलब्ध होता है। कर्मों के कटने और मोह के हल्का पड़ने से भीतर जो अनुकूल संवेदन या सुखानुभूति होती है, वही सच्चा सुख है। दृष्टिकोण के अंतर का जीवन के आचरण पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। एक सांसारिक दृष्टि वाले व्यक्ति को जो सांसारिक गीत, नाटक और आभूषण बहुत आकर्षक और आनंददायक लगते हैं, वही एक वैरागी और आध्यात्मिक साधक को विलाप के समान, नाट्य विडंबना और आभूषण मात्र एक भार प्रतीत होते हैं। संसार के सारे काम-भोग दुखों का आह्वान करने वाले हैं। जब व्यक्ति को इन भोगों में दुख नजर आने लग जाए और मोह का हल्कापन हो जाए, तभी वह सन्यास और साधुत्व की ओर अग्रसर हो सकता है।

आचार्यश्री ने आगे फरमाया कि संयम में रमण करने वाले साधक के लिए जीवन देवलोक के समान सुखमय बन जाता है, जबकि संयम के अभाव में वही जीवन महानरक तुल्य हो सकता है। बाहरी खाने-पीने के आकर्षण से दूर रहकर भीतर की आनंदानुभूति प्राप्त करने के लिए साधक को निरंतर जागरूक रहना चाहिए और आत्म-चिंतन करना चाहिए कि वह अपनी साधना, तप, जप और स्वाध्याय को कैसे निखार सकता है। प्रवचन में गुरुदेव ने जीवन में स्वावलंबन और श्रमशीलता पर विशेष बल देते हुए कहा कि व्यक्ति को अपने छोटे-छोटे कार्य स्वयं करने का प्रयास करना चाहिए। अपना कार्य खुद करने से न केवल दूसरों पर भार कम पड़ता है, बल्कि व्यक्ति को स्वयं निर्जरा यानी कर्म क्षय का सीधा लाभ मिलता है। साधक के मन में यह उत्कृष्ट भावना होनी चाहिए कि वह अपने हिस्से की निर्जरा का लाभ दूसरों को क्यों दे, बल्कि खुद उसका भागीदार बने। अपनी आयु, शारीरिक क्षमता और औचित्य के अनुसार जो व्यक्ति स्वावलंबी रहता है, आलस्य से दूर रहकर निरंतर श्रम करता है, ज्ञान, दर्शन, चारित्र और सेवा के मार्ग पर चलता है, उसी का सच्चा आत्मिक विकास होता है।

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