धर्मराजस्थानसामाजिक/ धार्मिक

संयमित इन्द्रियां मोक्ष का मार्ग करती हैं प्रशस्त : अध्यात्मवेत्ता आचार्यश्री महाश्रमण

मुख्यमुनिश्री के ग्यारहवें मनोनयन दिवस पर शान्तिदूत ने दिया मंगल आशीष

-साध्वीप्रमुखाजी व साध्वीवर्याजी सहित अनेक चारित्रात्माओं ने भी मुख्यमुनिश्री को किया वर्धापित

-मुख्यमुनिश्री ने भी गुरुचरणों में अर्पित की विनयांजलि, मिला मंगल आशीर्वाद

15.05.2026, शुक्रवार, लाडनूं :तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास कर रहे जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में शुक्रवार को मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी के 11वें मनोनयन दिवस का आयोजन भी आध्यात्मिक रूप में आयोजित किया गया। आचार्यश्री ने मुख्यमुनिश्रिओ को मंगल आशीष प्रदान किया तो साध्वीप्रमुखाजी व साध्वीवर्याजी सहित साधु-साध्वी समुदाय ने भी वर्धापित किया।

शुक्रवार को नित्य की भांति सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को तेरापंथाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘इन्द्रिय संयम की साधना के प्रयोग’ को वर्णित करते हुए कहा कि हमारी पांचों ज्ञानेंद्रियाँ—श्रोत्र (कान), चक्षु (आंख), घ्राण (नाक), रसन (जीभ) और स्पर्शन (त्वचा)—बाहरी संसार को समझने के लिए झरोखों के समान हैं, किंतु आध्यात्मिक यात्रा तब शुरू होती है जब हम इन इंद्रियों के माध्यम से बाहर भटकने के बजाय अपनी ऊर्जा को भीतर की ओर मोड़ते हैं। यदि इंद्रियां बेलगाम हों तो वे आत्मा को संसार के बंधनों में उलझा देती हैं, किन्तु संयमित इंद्रियां ही मोक्ष और परम शांति का मार्ग प्रशस्त करती हैं। अध्यात्म में आत्मा ही मूल तत्व है, और उसे जानने के लिए शरीर की स्थिरता अनिवार्य है। जब शरीर स्थिर होता है और इंद्रियां बाहरी विषयों से हट जाती हैं, तब व्यक्ति सूक्ष्म और अतींद्रिय ज्ञान की ओर अग्रसर होता है। अतींद्रिय ज्ञान के माध्यम से उन रहस्यों को भी जाना जा सकता है जो हमारी चर्म चक्षुओं से ओझल हैं, लेकिन इसकी पूर्व शर्त स्वयं पर पूर्ण नियंत्रण और अनुशासन है।

संकल्प की शक्ति से ही असंभव को संभव बनाया जा सकता है। ज्ञान और ध्यान की साधना केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि पूरे संघ और शासन की गौरव वृद्धि के लिए होनी चाहिए। अनुशासन को केवल बाहरी प्रतिबंध न मानकर इसे जीवन की शैली बनाने का प्रयास हो, ताकि साधक के भीतर प्रज्ञा का दीप प्रज्वलित हो सके।

मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चतुर्दशी के सन्दर्भ में हाजरी का वाचन करते हुए चारित्रात्माओं को विविध प्रेरणाएं प्रदान कीं। उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र उच्चरित किया।

मुख्यमुनिश्री के मनोनयन दिवस के अवसर पर आचार्यश्री ने मंगल प्रेरणा प्रदान करते हुए मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
इस अवसर पर साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी व साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने भी मुख्यमुनिश्री को वर्धापित किया। संतवृन्द ने मुख्यमुनिश्री की वर्धापना में गीत का संगान किया। साध्वीवृन्द ने भी गीत को प्रस्तुति दी। साध्वी राजीमतीजी, साध्वी कनकश्रीजी, साध्वी कल्पलताजी सहित अनेक वरिष्ठ साध्वियों ने मुख्यमुनिश्री की वर्धापना में अपनी अभिव्यक्ति दी। आज के अवसर पर मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने ह्रदयोद्गार व्यक्त करते हुए आचार्यश्री के प्रति अपनी श्रद्धा समर्पित की।

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