राजस्थानसामाजिक/ धार्मिक

स्वयं सत्य की खोज का हो प्रयास : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण 

सत्य की खोज: मैत्री के लिए’ विषय को आचार्यश्री ने किया व्याख्यायित

मुख्यमुनिश्री ने अणुव्रत के संदर्भ में दिया उद्बोधन आचार्यश्री ने नेपाली नववर्ष के संदर्भ में सुनाया मंगलपाठ लाडनूं :उत्तराध्ययन के छठे अध्ययन के दूसरे श्लोक में बताया गया है कि सच्चाई को जानने का प्रयास करना और इसके साथ साधना का योग हो जाता है तो सच्चाई की खोज या प्राप्ति व उसे प्रगट करने में दृढ़ता भी हो। पहली बात हो गई कि सच्चाई की खोज हो। दूसरी बात सच्चाई की प्राप्ति हो जाए। इसके लिए अनाग्रह की भावना होनी चाहिए। जिस आदमी के दिमाग में दुराग्रह नहीं होता, अनाग्रह की भावना हो तो सच्चाई का साक्षात्कार हो सकता है। इसके साथ-साथ आदमी में समीक्षा की बुद्धि होती है तो आदमी का ज्ञान और अच्छा विकास हो सकता है। आदमी को सच्चाई का अन्वेषण करने का प्रयास होना चाहिए।           

आदमी को सच्चाई के प्रति रुझान रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को आग्रही होने से बचने का प्रयास करना चाहिए। आग्रही आदमी युक्ति को अपनी मान्यता पर ले जाने का प्रयास करता है। आदमी को सच्चाई को जानने के लिए अनाग्रह भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को सच्चाई के साथ-साथ संघीय मान्यता पर भी ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। आदमी में सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस होना चाहिए। हालांकि यह साहस हर किसी में हो, ऐसा आवश्यक भी नहीं है। आदमी को स्वयं सत्य का अन्वेषण करने का प्रयास करना चाहिए।

आदमी को प्राणियों के साथ मैत्री की भावना रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी स्वयं जीए और दूसरों को भी जीने देने का प्रयास करना चाहिए। कहा भी गया है- जीयो और जीने दो। आदमी को जीवन में संयम और शांति रखने का प्रयास करना चाहिए। इसी प्रकार दूसरों को जीने देने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को किसी भी जीव को न मारने की भावना हो तो सभी जीवों के साथ मैत्री की भावना का विकास हो सकता है। उक्त पावन पाथेय जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगलवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को प्रदान किया। आचार्यश्री ने आज के निर्धारित विषय ‘सत्य की खोज: मैत्री के लिए’ को व्याख्यायित किया।                                                                                                                       

आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने अणुव्रत के संदर्भ में अपनी अभिव्यक्ति दी। अणुव्रत से जुड़े हुए विद्यार्थियों आदि के लिए जिज्ञासा का अवसर भी प्रदान किया गया। इस दौरान अन्य जिज्ञासाओं को भी आचार्यश्री द्वारा समाहित किया गया।

आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में नेपाल से समागत बालिका आराध्या गोलेछा ने अपनी प्रस्तुति दी। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में नेपाली नववर्ष के संदर्भ में भी श्रद्धालु उपस्थित थे। आचार्यश्री ने उन्हें नववर्ष के संदर्भ में मंगलपाठ सुनाते हुए मंगल प्रेरणा प्रदान की।

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