राजस्थानसामाजिक/ धार्मिक

 प्रियंकर और प्रियवादी बने : आचार्य श्री महाश्रमण 

 व्यवहार कुशल बनने हेतु गुरुदेव ने किया प्रेरित

लाडनूं :आराध्य की अभ्यर्थना में चारित्र आत्माओं द्वारा प्रस्तुतियां

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी लाडनूं का जैन विश्व भारती परिसर इन दिनों ‘योगक्षेम वर्ष’ की अपार आध्यात्मिक ऊर्जा और गुरुभक्ति से गुंजायमान है। अहिंसा यात्रा के प्रणेता, जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सानिध्य में यहां प्रतिदिन धर्म और ज्ञान की अमृत वर्षा हो रही है, जिसका लाभ देश-विदेश से पहुंच रहे श्रद्धालु उठा रहे हैं।
इसी कड़ी में शनिवार को विशाल सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को संबोधित करते हुए शांतिदूत आचार्य श्री ने मंगल महामंत्रोच्चार के साथ मुख्य प्रवचन का शुभारम्भ किया। साध्वियों ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। गुरूदेव के मुख्य प्रवचन पश्चात अभिवन्दना के क्रम में साध्वी कुसुमप्रभा जी और साध्वी सम्यक प्रभा जी ने प्रस्तुति दी। साध्वियों ने समूह रूप में संवादात्मक प्रस्तुति भी दी।                                 

मुख्य उद्बोधन में आगमों का संदर्भ देते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी ने फरमाया कि जो गुरुकुल में रहता है, वही वास्तव में शिक्षा और ज्ञान का सच्चा अधिकारी बनता है। गुरुकुल वास के दो मुख्य अर्थ स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा—एक गुरु की सन्निधि, निकटता में रहना और दूसरा उनकी आज्ञा में रहना। गुरु के साक्षात् सान्निध्य में रहने से ज्ञान का भागी बनने, चारित्र को निर्मल करने और दर्शन यानि श्रद्धा में स्थिरता प्राप्त करने का विशेष अवसर मिलता है। अन्य क्षेत्रों में विचरने पर अन्य जिम्मेदारियों के कारण अध्ययन के लिए समय कम भी मिल सकता है, जबकि गुरुकुल वास में अनेक विषयों के ज्ञाता संतों का मार्गदर्शन और समय की अनुकूलता सहज ही मिल जाती है। हालांकि, सबसे महत्वपूर्ण गुरु की दृष्टि और आज्ञा में रहना है, यदि गुरु की आज्ञा से बाहर भी विचरना पड़े, तो वह भी गुरुकुल वास ही है। इसके विपरीत, गुरु की आज्ञा के प्रति अजागरूक व्यक्ति निकट रहकर भी गुरुकुल वास से बाहर ही माना जाएगा। अतः हमें योगवान और समाधि में रहकर शिक्षा ग्रहण करने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।                                                                 

व्यावहारिक कुशलता और सौम्य व्यवहार की महत्ता को रेखांकित करते हुए शांतिदूत आचार्य श्री ने कहा कि शिक्षा उसी को प्राप्त होती है जो प्रियंकर, प्रिय करने वाला और प्रियवादी होता है। हमारे व्यवहार में सदैव मधुरता और सम्मान झलकना चाहिए। बड़े संतों के कुछ कहने या उलाहना देने पर भी विनयपूर्वक हाथ जोड़ लेना, या उनके पधारने पर बोलो की जगह ‘फरमाओ’ और ‘कृपा कराई’ जैसे सम्मानसूचक शब्दों का प्रयोग करना हमारे आचरण को गरिमापूर्ण बनाता है। सत्य और प्रिय का हमेशा योग होना चाहिए, मीठा बोलना एक प्रकार का वशीकरण मंत्र है, जो सुख और सौहार्द उत्पन्न करता है। जिस प्रकार छोटों को बड़ों के प्रति विनयी होना चाहिए, उसी प्रकार बड़ों का भी छोटों के प्रति वात्सल्यपूर्ण व्यवहार होना चाहिए। हमारे जैन आगमों में व्यवहार कौशल के अनेक गरिमापूर्ण सूत्र छिपे हैं, जिन पर गहरा अनुसंधान होना चाहिए। सभी को यह प्रयास करना चाहिए कि क्रोध का परित्याग कर अपनी बात शांति से रखें और हमारा जीवन सदैव आध्यात्मिकता व औचित्य से ओत-प्रोत रहे।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button