पूर्व कर्मों के क्षय के लिए जीएं जीवन: युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
आचार्यश्री ने ‘जीवन क्यों जीएं?’ विषय को किया वर्णित

लाडनूं :जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शनिवार को सुधर्मा सभा में समायोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘जीवन क्यों जीएं?’ विषय को प्रतिपादित करते हुए कहा कि मानव के मन में दो प्रश्न हो सकता हैं- पहला कि हमारा जीवन क्या है, इसका स्वरूप क्या है तथा दूसरा कि इस जीवन को क्यों जीएं? इसका शास्त्रों के माध्यम से उत्तर प्राप्त होता है कि यह औदारिक शरीर और आत्मा इन दो तत्त्वों के संयोग ही जीवन है। जहां औदारिक शरीर और आत्मा दोनों सम्मिलित होते हैं, वहां जीवन होता है। जहां औदारिक शरीर और आत्मा का वियोग हो जाता है, वहां मृत्यु हो जाती है। वहीं जहां आत्मा का औदारिक शरीर से हमेशा के लिए वियोग हो जाए, वहां मोक्ष की स्थिति बन जाती है। जीवन, मृत्यु और मोक्ष ये जीवन की तीन स्थितियां होती हैं। कोरा शरीर है तो वहां भी जीवन नहीं होता है तथा जहां कोरी आत्मा होती है, वहां भी जीवन नहीं होता। आत्मा और शरीर का संयोग ही जीवन होता है। 
जीवन जीने के लिए कितना कार्य करना पड़ता है। भोजन, पानी, वस्त्र, मकान आदि-आदि। गृहस्थ जीवन में तो और अधिक कार्य हो सकता है। एक साधु को भी अपना जीवन चलाने के लिए कितने यत्न करने पड़ते हैं। जीवन क्यों जीना चाहिए- इसके संदर्भ में एक प्रेरणा प्रदान की गई है कि आदमी को अपनी आत्मा को मोक्ष की ओर ले जाने के लिए इस जीवन का परम लक्ष्य होना चाहिए। मोक्ष की प्राप्ति के लिए आदमी को साधना की दिशा आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। आहार का अल्पीकरण, उपकरणों के प्रति अल्पोपधि, अहिंसा का पालन, संयम का पालन, ध्यान, साधना के द्वारा आदमी अपने जीवन को मोक्ष की ओर ले जा सकता है। 
साधुओं के पास ज्यादा संग्रह नहीं होना चाहिए। अनावश्यक सामानों को छोड़ने का प्रयास करना चाहिए। प्रतिलेखन होने से, अल्पोपधि होने से हिंसा आदि दोषों से भी बचाव हो सकता है। साधु हो अथवा आदमी उसे बाह्य आकर्षण से बचने का प्रयास करना चाहिए। अवांछनीय संग्रह की वृत्ति से बचने का प्रयास करना चाहिए। जहां तक संभव हो, धर्म, ध्यान, साधना करते रहने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार कहा जा सकता है कि पूर्व कर्मों का क्षय करने के लिए और आत्मा को मोक्ष की दिशा में ले जाने के लिए आदमी को जीवन जीना चाहिए। शरीर रूपी नौका के माध्यम से पूर्व कर्मों का क्षय करने के लिए जीवन जीना चाहिए। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को भी सामहित किया। 
आज आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में छत्रपति संभाजीनगर से उपस्थित श्रद्धालुओं के साथ भूतपूर्व गृहह राज्यमंत्री श्री राजेन्द्र दर्डा भी उपस्थित थे। मंगल प्रवचन के उपरान्त उन्होंने आचार्यश्री के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके पूर्व प्रातःकालीन प्रवचन में साध्वीवृंद के प्रज्ञागीत का संगान किया। आचार्यश्री ने समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को ध्यान का प्रयोग भी कराया।



