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 नियमों के प्रति हो जागरूकता तो निर्मल हो सकता है चारित्र : महातपस्वी महाश्रमण

आचार्यश्री ने निर्धारित विषय को आगम के माध्यम से किया व्याख्यायित

06.08.2026, गुरुवार, लाडनूं :जन-जन को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रेरणा देने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान सुधर्मा सभा में उपस्थित विशाल जनमेदिनी व चारित्रात्माओं आदि को आज के निर्धारित विषय ‘क्या है चारित्र?’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि मोक्ष तो चार अंगों वाला है। उसका एक अंग चारित्र है। चारित्र की एक परिभाषा यह होती है कि समता भाव को चारित्र कहा जाता है। इसको मूल भाग में रखने के बाद ही महाव्रत, समिति, गुप्तियां होती हैं। महाव्रत, समितियों व गुप्तियों का प्राण तत्त्व समता भाव होता है। सम भाव है तो अशुभ योग नहीं हो सकता। अशुभ योग का अभाव भी अपने आप में चारित्र की आराधना हो सकता है।

पच्चीस बोल का अंतिम बोल है चारित्र पांच। सामायिक को पहला चारित्र कहा गया है। सामायिक चारित्र में सर्व सावद्य योग का तीन करण तीन योग से प्रत्याख्यान होता है।
सामायिक चारित्र स्वल्पकालिक और जीवन भर का भी हो सकता है। सर्व सावद्य योग से विरमण हो जाता है तो वह ही बहुत बड़ा होता है। छेदोपस्थापनीय त्याग में पांच महाव्रतों को स्वीकृत कराया जाता है। परिहार विशुद्धि का भी प्रयोग होता है। चौथी बात सूक्ष्म संप्राय। लोभ दसवें गुणस्थान तक भी सूक्ष्म रूप में अस्तित्व में रहता है। यथाख्यात चारित्र अकषाय होता है।                                             

समभाव वाली व्यवस्था पहले गुणस्थान से लेकर चौदहवें गुणस्थान तक लागू होती है। साधु एक मुहूर्त तक श्रुत सामायिक लेकर जो स्वाध्याय करता है, वह बहुत अच्छा होता है। यह चारित्र कर्म के संचय को खाली करने वाला होता है। चारित्र के कारण नए कर्मों का आना बंद हो जाता है तो यह बड़ी बात हो जाती है। यह चारित्र की एक निष्पत्ति है। चारित्र के अंतर्गत शुभ योग में तप होता है। चारित्र जिसमें भी होता है, बहुत बड़ी बात होती है। साधु को अपने चारित्र को निर्मल बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। साधु अपने काय गुप्ति का ध्यान रखे। वचन गुप्ति पर भी विशेष ध्यान देने का प्रयास होना चाहिए। इसके साथ मन की चंचलता को भी कम करने का प्रयास करना चाहिए। काय गुप्ति सध जाए तो मन की चंचलता को कम किया जा सकता है। आचार्यश्री ने प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि प्रेक्षाध्यान के माध्यम से अपने मन की चंचलता को नियंत्रित किया जा सकता है। गुरुदेव तुलसी ने प्रेक्षाध्यान की प्रेरणा भी दी। चलते, बोलते और सोते हुए भी ध्यान किया जा सकता है। तेरह नियमों के प्रति जागरूकता रहे तो चारित्र निर्मल रह सकता है।

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