बहिरात्मा से अंतरात्मा बनें-आचार्य शिवमुनि

सूरत।आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में समाधि तंत्र की चर्चा करते हुए फरमाया कि पूज्यपाद शास्त्र अवमान और एकाग्र मन से, अनुभव करके, अपनी शक्ति के अनुसार निर्मल मन से अतिन्द्रिय सुख व मोक्ष की प्राप्ति वालों के लिए समाधि तंत्र ग्रंथ की रचना करते हैं। पंचम काल में व्यक्ति धन, पद, प्रतिष्ठा, संतान प्राप्ति की आकांक्षा रखता हैं, अनुकूल परिस्थिति को वह सुख मानता है, किंतु यह सुख नहीं पुण्योदय से प्राप्त बाहरी सुख है। पुण्य जब क्षीण हो जाता है सब कुछ चला जाता है, व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र में उलझा रहता है। अतिन्द्रिय सुख वह है जिसमें शरीर चाहे रोगों से ग्रसित हो जाए, परिवार के लोग साथ दे या न दे, परिस्थितियां प्रतिकूल हो जाए, अंतर मन से वह समाधि में लगा रहे इस दृष्टि से इस समाधि तंत्र ग्रंथ की रचना की गई है।
आचार्य भगवन ने बहिरात्मा का विश्लेषण करते हुए फरमाया कि जिनके कान बाहर से सुनते हैं, जीह्वा बाहर से स्वाद लेती है, नासिका बाहर से गंध लेती है, आंखें बाहर से देखती है वह बहिरात्मा है, वह बाहर का सुख है, व्यक्ति स्वयं निणर्य करे कि वह बहिरात्मा है या अंतरात्मा।
उन्होंने आगे फरमाया कि व्यक्ति चित्त के राग-द्वेष से भ्रमित हो जाता है। राग-द्वेष दो बीज है जो मोह से उत्पन्न होते हैं। मोहनीय कर्म एक सेनापति की तरह है। व्यक्ति संसार में मोह के कारण उलझा हुआ है। परिवार, माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी, पद-प्रतिष्ठा ये सब मोह के कारण हैं। राग-द्वेष दो पाट हैं उनमें उलझे हुए हैं।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने प्रकृति बंध के भेद की चर्चा में फरमाया कि प्रकृति बंध के आठ भेद में आठ कर्म है – ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयुष्य, नाम, गौत्र और अंतराय रूप है। आठ भेद के अंतर्गत आठ कर्म आते हैं। ज्ञानावरण कर्म जो आत्मा के ज्ञान गुणों को ढक देता है, आत्मा के पास अनंत ज्ञान है, किंतु ज्ञानावरण कर्म के कारण प्रकट नहीं होने देता है। हमारे पास तीन लोक को जानने और देखने की शक्ति है। दर्शनावरण कर्म में देखने की शक्ति को व्यक्त नहीं होने देता।
श्री निशांत मुनि जी म. सा. ने ‘‘अनंत शक्ति भण्डार है यह चेतन हमारा’’ भजन के द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त की




