राजस्थानलोकल न्यूज़सामाजिक/ धार्मिकसूरत सिटी

धर्म के प्रति हो गहरी श्रद्धा : महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्यश्री ने ‘धर्मश्रद्धा से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से किया व्याख्यायित

चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को आचार्यश्री ने किया उत्तरित

09.08.2026, रविवार, लाडनूं :

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान, अखण्ड परिव्राजक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने रविवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के उपस्थित श्रद्धालुओं को आज के निर्धारित विषय ‘धर्मश्रद्धा से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से विवेचित करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि जीव धर्मश्रद्धा से क्या प्राप्त करता है? धर्म के प्रति श्रद्धा का होना भी विशेष बात होती है। श्रद्धा परम दुर्लभ होती है। आदमी कितनी चीजों को देखता है, जानता है, सुनता है, किन्तु धर्म के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा हो जाए, बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। नमस्कार महामंत्र की माला नाश्ता से पहले-पहले हो जाए तो कितनी अच्छी बात हो सकती है। प्रतिदिन प्रातःकाल सामायिक भी हो जाती है तो बहुत अच्छी बात होती है। सामायिक में मोबाइल आदि का प्रयोग तो वर्जित ही रहे।

इसके अलावा भी आदमी जप, स्वाध्याय, ध्यान आदि का प्रयोग कर सकता है। धर्म के प्रति अपनी आस्था व श्रद्धा को और अधिक मजबूत बनाने का प्रयास करना चाहिए। शास्त्र में बताया गया कि धर्मश्रद्धा से आदमी सातसौख्य से आदमी विरक्त हो सकता है। कर्म कटने से सुख मिलता है, जो आत्मा की निर्मलता से प्राप्त होता है। आध्यात्मिक सुख बहुत अच्छी बात हो सकती है। दुनिया में भौतिक चीजें तो मिल सकती हैं, परन्तु आत्मिक सुख उनसे नहीं प्राप्त हो सकता। धर्मश्रद्धा से सातसौख्य से विरक्ति हो सकता है। सातवेदनीय कर्म के उदय से जो सुख, अनुकूलता प्राप्त होती है। असातवेदनीय कर्म के उदय से शरीर में बीमारी हो जाती है। सातवेदनीय जनित भौतिक सुख से भी विरक्ति हो जाती है, जिसमें धर्मश्रद्धा होती है।

ऐसी श्रद्धा भावना जागृत हो कि अगार भावना को छोड़कर अणगार धर्म को स्वीकार कर लेता है, वह धर्मश्रद्धा के द्वारा ही होता है। धर्म श्रद्धा होती है तो आदमी घर-परिवार का त्याग कर साधना के पथ आगे बढ़ सकता है। आदमी पदार्थों से विरक्ति का भाव रखे। उन विषयों से मिलने वाले सुख के प्रति भी वैराग्य की भावना हो जाती है। जो धर्मश्रद्धा वाला होता है और अगार धर्म को छोड़कर अणगार बन जाता है। साधना करते-करते वह दुःखों का विच्छेद कर सुख को प्राप्त कर लेता है। वह परम सुख को भी प्राप्त कर सकता है। निर्बाध सुख की प्राप्ति धर्मश्रद्धा से ही प्राप्त की जा सकती है।

इस प्रकार आदमी के जीवन में धर्मश्रद्धा का बहुत बड़ा महत्त्व है। साधु में ही नहीं, श्रावक-श्राविकाओं में धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा हो, ऐसा प्रयास होना चाहिए। देव, गुरु और धर्म के प्रति आस्था हो। देव, गुरु और धर्म के प्रति आस्था न डिगे। कठिनाई की स्थिति में अपनी श्रद्धा को अडोल बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को ईमानदारी के प्रति आस्था, श्रद्धा रखने का प्रयास करना चाहिए।

जिस बात पर आदमी को श्रद्धा हो जाती है, उसके पालन में आने वाली कठिनाई को भी पार कर आदमी उसका पालन करता है। इसलिए आदमी को अपने जीवन में अगाध धर्मश्रद्धा रखने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री की अनुज्ञा से मुनि दिनेशकुमारजी ने अडिग श्रद्धा के संदर्भ में आचार्यश्री तुलसी द्वारा रचित गीत का आंशिक संगान किया। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर भी प्रदान किए। मंगलपाठ के उपरान्त जैन विश्व भारती द्वारा अनेक पुस्तकों को भी लोकार्पित किया गया।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button